श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में अब सभी श्रद्धालु एक ही कतार में खड़े होकर प्रभु श्रीराम और राम दरबार के अलौकिक दर्शन कर सकेंगे। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने मंदिर परिसर से वीआईपी पास की व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त करने का एक बड़ा और महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। इस कदम का अयोध्या धाम के साधु-संतों, विचारकों और आम श्रद्धालुओं ने पुरजोर स्वागत किया है। संतों का मानना है कि भगवान के पावन दरबार में हर भक्त समान है और इस निर्णय से न केवल पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि सुगम दर्शन की व्यवस्था भी सुनिश्चित होगी।
‘भगवान के दरबार में कोई वीआईपी नहीं’: महंत विजय दास
कंचन भवन के महंत विजय दास ने ट्रस्ट के इस कदम को अत्यंत सामयिक और दूरगामी बताया। उन्होंने कहा कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने निश्चित रूप से जमीनी स्थितियों और श्रद्धालुओं की सहूलियत को ध्यान में रखते हुए यह ठोस फैसला लिया है। अब देश-विदेश से आने वाले करोड़ों रामभक्तों को किसी विशेषाधिकार वाले पास के बिना, सहज और सुगम तरीके से रामलला और राम दरबार के दर्शन प्राप्त हो सकेंगे। आम श्रद्धालु लंबे समय से इस प्रकार की पारदर्शी व्यवस्था का इंतजार कर रहे थे।
समानता का संदेश और स्थानीय निवासियों के लिए व्यवस्था
रामादल ट्रस्ट के अध्यक्ष कल्कि राम ने भी इस निर्णय का पूर्ण समर्थन करते हुए वीआईपी और वीवीआईपी संस्कृति को जड़ से समाप्त करने की पैरवी की। उनका कहना है कि मंदिर में प्रवेश और दर्शन का नियम ऐसा होना चाहिए जिससे लाइन में लगे अंतिम व्यक्ति के मन में भी किसी भेदभाव या हीन भावना का विचार न आए। इसके साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि दिव्यांग श्रद्धालुओं और अयोध्या के स्थानीय नागरिकों के लिए जो विशेष रियायतें दी गई हैं, वे व्यावहारिक हैं और उन्हें जारी रखा जाना चाहिए। अयोध्या के राम मंदिर को पूरे देश के लिए एक ऐसा आदर्श स्थापित करना चाहिए जहां केवल भक्ति और भाव प्रधान हो, न कि कोई सामाजिक या आर्थिक हैसियत।
‘सच्ची श्रद्धा का सम्मान, खत्म हो विशेषाधिकार’: दिवाकर आचार्य
प्रख्यात विचारक दिवाकर आचार्य ने इस निर्णय को भगवान श्रीराम के समतावादी आदर्शों के अनुरूप करार दिया। उन्होंने कहा कि जिन रामभक्तों ने मंदिर निर्माण और प्रभु सेवा के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया, वे कभी किसी जाति, धर्म, पहचान पत्र या आर्थिक संपन्नता के आधार पर विशेष सुविधा के आकांक्षी नहीं रहे। अब तक जो व्यवस्था चल रही थी, उसमें सामान्य भक्त घंटों कतारों में प्रतीक्षा करते थे, जबकि कुछ लोगों को वीआईपी पास के जरिए तुरंत दर्शन करा दिए जाते थे। इस फैसले से सच्ची श्रद्धा का मान बढ़ा है और सभी के लिए प्रभु के द्वार समान रूप से खुल गए हैं।
धार्मिक स्थलों के लिए नजीर बनेगा यह फैसला
संत समाज का मानना है कि अयोध्या में लिया गया यह निर्णय देश के अन्य प्रमुख धार्मिक स्थलों और मंदिरों के लिए भी एक मार्गदर्शक नजीर साबित होगा। प्रभु श्रीराम ने स्वयं अपने जीवन में शबरी के बेर खाकर और निषादराज को गले लगाकर सामाजिक समानता का संदेश दिया था। ट्रस्ट का यह कदम उसी रामराज्य की अवधारणा को सजीव करता है। इस ऐतिहासिक फैसले से आम रामभक्तों में अत्यधिक उत्साह है और वे बिना किसी बाधा के प्रभु के दर्शन कर अपनी यात्रा को सफल बना सकेंगे।





















































