उत्तर प्रदेश सरकार विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को प्रारंभिक स्तर पर ही एक अनुकूल और सशक्त शैक्षिक माहौल देने के लिए बड़ी पहल करने जा रही है। प्रदेश के सभी 75 जिलों में स्थित को-लोकेटेड आंगनबाड़ी केंद्रों की कार्यकर्ताओं और प्री-प्राइमरी नोडल अध्यापकों को समावेशी शिक्षा का विशेष प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा। प्रत्येक बच्चे के सीखने की क्षमता और व्यक्तिगत जरूरतें अलग होती हैं। ऐसे में दिव्यांग अथवा विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की समय रहते पहचान करना और उन्हें प्रारंभिक अवस्था में ही सही मार्गदर्शन देना उनकी भावी शिक्षा के लिए एक मजबूत आधार तैयार करता है। इसी सोच को साकार करने के उद्देश्य से राज्य सरकार आंगनबाड़ी व्यवस्था को समावेशी शिक्षा की पहली और मजबूत सीढ़ी के रूप में विकसित कर रही है।
₹2.98 करोड़ का बजट स्वीकृत, दो चरणों में पूरा होगा प्रशिक्षण
इस पूरी प्रशिक्षण परियोजना को जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए समग्र शिक्षा के राज्य परियोजना निदेशक कार्यालय द्वारा लगभग 2.98 करोड़ रुपये की वित्तीय सीमा जारी की गई है। इस बजट में से 17.70 लाख रुपये मास्टर ट्रेनर्स के उच्च स्तरीय प्रशिक्षण पर खर्च किए जाएंगे, जबकि 2.80 करोड़ रुपये की विशाल राशि ब्लॉक स्तर पर आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को दिए जाने वाले प्रशिक्षण के लिए तय की गई है।
यह प्रशिक्षण अभियान दो महत्वपूर्ण चरणों में संचालित हो रहा है:
- प्रथम चरण (3 अगस्त से 30 अगस्त): जिला स्तर पर एकेडमिक रिसोर्स पर्सन (एआरपी) को मास्टर ट्रेनर्स के रूप में प्रशिक्षित किया जा रहा है। ये मास्टर ट्रेनर्स ब्लॉक स्तर पर होने वाले कार्यक्रमों की कमान संभालेंगे।
- द्वितीय चरण (1 सितंबर से 30 सितंबर): ब्लॉक स्तर पर आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और प्री-प्राइमरी नोडल शिक्षकों का संयुक्त प्रशिक्षण आयोजित किया जाएगा।
व्यवहारिक पद्धतियों और यूनिसेफ के सहयोग से तैयार होगी अध्ययन सामग्री
प्रशिक्षण कार्यक्रम को अधिक व्यावहारिक और प्रभावी बनाने के लिए गतिविधि-आधारित पद्धतियों पर जोर दिया जा रहा है, ताकि मास्टर ट्रेनर्स जटिल विषयों को भी बेहद आसान तरीके से प्रतिभागियों को समझा सकें। इस पाठ्यक्रम को तैयार करने में भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय तथा यूनिसेफ का विशेष योगदान रहा है। अध्ययन सामग्री में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की शीघ्र पहचान, शुरुआती हस्तक्षेप, समावेशी वातावरण का निर्माण और दिव्यांगता समावेशन जैसे बेहद संवेदनशील विषयों को शामिल किया गया है। इससे धरातल पर काम करने वाली कार्यकर्ताओं को बच्चों की सीखने संबंधी भिन्न-भिन्न प्राथमिकताओं को समझने में सुलभता होगी।
विभागों में बेहतर समन्वय और कड़ी निगरानी के निर्देश
स्कूल शिक्षा महानिदेशक एवं राज्य परियोजना निदेशक मोनिका रानी ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि प्रशिक्षण की गुणवत्ता से कोई समझौता न किया जाए। उन्होंने शत-प्रतिशत सहभागिता और तय समय-सीमा के भीतर इस अभियान को संपन्न कराने पर बल दिया है। जिला स्तर पर इस कार्यक्रम की दैनिक आधार पर निगरानी की जाएगी और प्रशिक्षण पूरा होने के उपरांत विस्तृत प्रगति रिपोर्ट राज्य परियोजना कार्यालय को भेजी जाएगी।
बेसिक शिक्षा विभाग और बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार विभाग के बीच इस आपसी समन्वय से को-लोकेटेड आंगनबाड़ी केंद्रों में एक एकीकृत शिक्षण व्यवस्था बनेगी, जिससे न केवल विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को, बल्कि सामान्य बच्चों को भी एक सहयोगी वातावरण प्राप्त होगा।
बेसिक शिक्षा मंत्री संदीप सिंह का वक्तव्य
मामले पर बेसिक शिक्षा राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) संदीप सिंह ने कहा कि राज्य सरकार का मुख्य ध्येय हर बच्चे को उसकी क्षमता और आवश्यकता के अनुसार शिक्षा के समान अवसर देना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि दिव्यांग और विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की शुरुआती दौर में ही पहचान हो जाने से उनकी आगे की पढ़ाई का मार्ग आसान हो जाता है। यह संयुक्त प्रशिक्षण कार्यक्रम जमीनी स्तर पर समावेशी शिक्षा को बेहद मजबूत बनाएगा और हर बच्चे के लिए एक सुरक्षित, संवेदनशील और अनुकूल माहौल का निर्माण करेगा।





















































