उत्तर प्रदेश के बरेली जिले से स्वास्थ्य पेशे और इंसानियत को शर्मसार कर देने वाला एक खौफनाक मामला सामने आया है। यहां पुलिस ने एक ऐसे संगठित बाल तस्करी गिरोह (चाइल्ड ट्रैफिकिंग सिंडिकेट) का पर्दाफाश किया है, जिसकी मास्टरमाइंड अस्पताल में काम करने वाली एक नर्स निकली। यह शातिर गिरोह मुख्य रूप से गरीब और अविवाहित गर्भवती महिलाओं की मजबूरी का फायदा उठाकर उनके नवजात शिशुओं का सौदा करता था। पुलिस अब इस रैकेट से जुड़े सभी सदस्यों पर गैंगस्टर एक्ट के तहत सख्त कानूनी चाबुक चलाने और अपराध से अर्जित उनकी संपत्तियों को कुर्क करने की व्यापक तैयारी कर रही है।
मंदिर से मासूम के अपहरण ने खोली सिंडिकेट की पोल
इस पूरे अंतरराष्ट्रीय स्तर के जैसे प्रतीत होने वाले रैकेट का भंडाफोड़ एक अपहरण के मामले से हुआ। दरअसल, पुलिस और अधिकारियों की नजर में यह खूंखार गिरोह पिछले महीने तब आया, जब अपहरणकर्ताओं के चंगुल से डेढ़ साल के एक मासूम बच्चे को सकुशल मुक्त कराया गया। 24 मई को मनौना धाम मंदिर परिसर से ऋषभ नाम के एक मासूम को अगवा कर लिया गया था। पुलिस ने इस मामले की गुत्थी सुलझाते हुए जब कड़ियां जोड़ीं, तो एक के बाद एक कई चौंकाने वाले खुलासे होते चले गए।
60 हजार रुपये में हुआ था मासूम का सौदा
अपहृत बच्चे की तलाश में जुटी पुलिस टीम ने कड़ी मशक्कत के बाद एक मुठभेड़ के दौरान दो अपहरणकर्ताओं— योगेश कन्नौजिया और पवन सिंह को धर दबोचा। इन्हीं के पास से मासूम ऋषभ को सुरक्षित बरामद किया गया। पुलिसिया पूछताछ में जब इन गुर्गों के गिरेबान तक हाथ पहुंचा, तो उन्होंने उगल दिया कि यह कोई सामान्य अपहरण नहीं था। आरोपियों ने बताया कि उन्हें एक निःसंतान दंपती को बच्चा सौंपने का ठेका मिला था, जिसके एवज में उन्हें 60 हजार रुपये दिए जाने थे। इस कबूलनामे के बाद पुलिस ने जब गहराई से जांच शुरू की, तो फर्जी डॉक्टरों और दलालों के एक विशाल और संगठित नेटवर्क से पर्दा उठ गया।
सफेद कोट में छिपी थी खौफनाक ‘सरगना’ नर्स सीता
पुलिस जांच के अनुसार, इस पूरे अपहरण की पटकथा लखीमपुर के रहने वाले उत्तम बाजपेयी ने लिखी थी। उसे इस घिनौने काम का निर्देश सीतापुर के एक कथित झोलाछाप डॉक्टर संजय विश्वास और लखीमपुर-खीरी निवासी केशव राम उर्फ मंजेश ने दिया था। ये दोनों दलाल इस गिरोह के लिए बच्चों की सप्लाई का काम करते थे।
हैरानी की बात यह है कि इस पूरे सिंडिकेट का नियंत्रण एक महिला के हाथ में था। पुलिस सूत्रों ने बताया कि अगवा किए गए बच्चे को बरेली के ही एक प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज में कार्यरत नर्स ‘सीता’ को सौंपा जाना था। मूल रूप से बदायूं के दातागंज की रहने वाली और फिलहाल बरेली के मीरगंज में निवासरत यह नर्स ही इस खौफनाक सिंडिकेट की मुख्य मास्टरमाइंड (सरगना) है।
अविवाहित और लाचार महिलाओं की मजबूरी का उठाते थे फायदा
यह गिरोह बेहद शातिर तरीके से अपना शिकार चुनता था। जांचकर्ताओं को अहम सुराग मिले हैं कि यह नर्स और उसके गुर्गे उन अविवाहित गर्भवती महिलाओं को अपने जाल में फंसाते थे, जो समाज के डर से गुपचुप तरीके से अपना इलाज और प्रसव कराने अस्पतालों में आती थीं। गिरोह के सदस्य पहले इन घबराई हुई महिलाओं को सुरक्षित प्रसव और हर संभव मदद का झूठा भरोसा दिलाते थे। प्रसव के तुरंत बाद, ये लोग नवजात शिशुओं को गायब कर देते थे और मोटी रकम लेकर उन्हें निःसंतान दंपतियों को बेच देते थे। नर्स सीता के देशभर के कई बड़े निजी अस्पतालों और आईवीएफ (IVF) केंद्रों से गहरे संपर्क होने की बात सामने आई है। पुलिस अब सीता की कॉल डिटेल्स खंगाल रही है ताकि सफेदपोश चेहरों से नकाब उतारा जा सके।
अवैध संपत्ति होगी कुर्क, लगेगा गैंगस्टर एक्ट
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए बरेली के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) अनुराग आर्य ने कड़े तेवर अपनाए हैं। एसएसपी ने स्पष्ट किया है कि आरोपी बच्चों की चोरी और तस्करी के इस काले कारोबार को एक सुगठित कॉर्पोरेट तरीके से चला रहे थे। चूंकि यह एक संगठित अपराध है, इसलिए इन सभी आरोपियों के खिलाफ गैंगस्टर अधिनियम के तहत कठोरतम कार्रवाई की जाएगी।
वहीं, अपर पुलिस अधीक्षक (दक्षिण) अंशिका वर्मा ने बताया कि इस गिरोह के तार कई निजी क्लीनिकों और आईवीएफ सेंटर्स से जुड़े होने के पुख्ता संकेत मिले हैं। अब तक पुलिस ने इस मामले में छह मुख्य आरोपियों की पहचान कर ली है और बाकी बचे छिपे हुए सफेदपोश गुर्गों की तलाश के लिए दबिश का दौर लगातार जारी है।













































