उत्तर प्रदेश के सियासी और आपराधिक इतिहास के सबसे चर्चित मामलों में से एक, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के तत्कालीन विधायक राजू पाल हत्याकांड में एक नया मोड़ आया है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस मामले के मुख्य आरोपियों में शामिल और माफिया अतीक अहमद व अशरफ के बेहद करीबी गुर्गे आबिद को एक बड़ी कानूनी राहत दी है। अदालत ने सुनवाई के दौरान आबिद की सजा को तब तक के लिए निलंबित कर दिया है, जब तक कि उसकी मुख्य आपराधिक अपील पर अंतिम फैसला नहीं आ जाता। इसके साथ ही कोर्ट ने आरोपी को सशर्त जमानत पर रिहा करने का भी आदेश जारी कर दिया है, जिससे 19 साल पुराने इस हाई-प्रोफाइल मामले में कानूनी पैंतरेबाजी एक बार फिर सुर्खियों में है।
अदालत ने क्यों दी जमानत? जानिए खंडपीठ की बड़ी टिप्पणी
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की विशेष खंडपीठ ने इस मामले की गंभीरता और कानूनी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अपना फैसला सुनाया। उच्च न्यायालय ने साफ तौर पर कहा कि वर्ष 2024 से लंबित पड़ी आपराधिक अपील पर निकट भविष्य में अंतिम सुनवाई होने की संभावना बेहद कम नजर आ रही है। कोर्ट का मानना है कि अपील के निस्तारण में लगने वाले समय को देखते हुए आरोपी को लंबे समय तक जेल में रखना उचित नहीं होगा। इसी आधार पर खंडपीठ ने निर्णय लिया कि जब तक अदालत इस अपील पर किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुंच जाती, तब तक आबिद को जेल से बाहर जमानत पर रहने की अनुमति दी जा सकती है।
एफआईआर से नाम गायब: बचाव पक्ष की दलीलें आईं काम
सुनवाई के दौरान आरोपी आबिद की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने अदालत के सामने कई महत्वपूर्ण कानूनी कमियां रखीं, जो अभियोजन पक्ष के दावों को कमजोर करती नजर आईं।
बचाव पक्ष की मुख्य दलीलें:
- मूल एफआईआर में नाम नहीं: घटना के तुरंत बाद दर्ज की गई मूल प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) में आबिद का कहीं भी कोई जिक्र नहीं था।
- सह-आरोपियों का बयान: पुलिस ने आबिद के खिलाफ पूरी कार्रवाई महज अन्य सह-आरोपियों द्वारा जेल या हिरासत में दिए गए बयानों के आधार पर शुरू की थी।
- बरामदगी का अभाव: जांच एजेंसियों को आबिद के कब्जे या उसकी निशानदेही पर कोई भी ऐसा आपत्तिजनक सामान या हथियार बरामद नहीं हुआ, जो उसे इस अपराध से सीधे जोड़ सके।
- शिनाख्त परेड की कमी: पूरे मामले की जांच के दौरान पुलिस या केंद्रीय जांच एजेंसी ने आरोपी की कोई आधिकारिक पहचान परेड (Test Identification Parade) नहीं करवाई।
प्रत्यक्षदर्शियों ने भी नहीं पहचाना, कोर्ट ने उठाए जांच पर सवाल
अदालत ने मामले के दस्तावेजों और गवाहों के बयानों का गहन अध्ययन करने के बाद पाया कि स्थानीय पुलिस द्वारा दाखिल की गई चार्जशीट के बाद जब कोर्ट में गवाहियां दर्ज की जा रही थीं, तब किसी भी कथित प्रत्यक्षदर्शी ने आबिद की पहचान हमलावर के रूप में नहीं की थी। खंडपीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से दर्ज किया कि अभियोजन पक्ष जांच के किसी भी पड़ाव पर आरोपी की शिनाख्त स्थापित करने में पूरी तरह नाकाम रहा। किसी भी ठोस और स्वतंत्र साक्ष्य के अभाव में, सिर्फ सह-आरोपियों के बयानों के बूते किसी को लंबे समय तक सलाखों के पीछे नहीं रखा जा सकता, इसी वजह से अदालत ने उसकी सजा पर रोक लगाना सही समझा।
2005 का वो काला दिन: जब गोलियों से भून दिया गया था बसपा विधायक को
इस पूरे मामले की जड़ें साल 2005 की एक खूनी राजनीतिक रंजिश से जुड़ी हुई हैं। 25 जनवरी 2005 को इलाहाबाद (जो अब प्रयागराज के नाम से जाना जाता है) में बसपा के तत्कालीन विधायक राजू पाल की सरेराह अंधाधुंध गोलियां बरसाकर बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड ने पूरे उत्तर प्रदेश की सियासत में भूचाल ला दिया था। दरअसल, इसके पीछे साल 2004 में प्रयागराज पश्चिम विधानसभा सीट पर हुआ उपचुनाव था, जिसमें राजू पाल ने बाहुबली अतीक अहमद के सगे भाई अशरफ को करारी शिकस्त दी थी। इस अप्रत्याशित हार को माफिया गुट पचा नहीं पाया और इसी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के चलते राजू पाल को मौत के घाट उतार दिया गया था। अब 19 सालों के बाद, इस केस के एक अहम आरोपी को कोर्ट से मिली इस राहत को अभियोजन पक्ष के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है।


















































