लखनऊ। संसद का मानसून सत्र शुरू होने से ठीक पहले बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों को एक महत्वपूर्ण नसीहत दी है। उन्होंने आग्रह किया है कि संसद की कार्यवाही को केवल राजनीतिक विरोध, आरोप-प्रत्यारोप और हंगामे की भेंट चढ़ाने के बजाय देश की ज्वलंत समस्याओं के समाधान के लिए एक मंच के रूप में उपयोग किया जाना चाहिए। मायावती ने स्पष्ट किया कि जनता की उम्मीदें इस सत्र से जुड़ी हैं और यह समय है कि राजनीतिक दल अपने मतभेदों को भुलाकर आम आदमी से जुड़े मुद्दों पर गंभीरता से मंथन करें।
महंगाई और बेरोजगारी पर ठोस समाधान की दरकार
मायावती ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ के जरिए अपनी बात रखते हुए कहा कि देश की आम जनता भीषण महंगाई, गरीबी और बेरोजगारी जैसी समस्याओं से जूझ रही है। इसके अलावा, परीक्षाओं के पेपर लीक होने की घटनाओं ने युवाओं के भविष्य को अधर में लटका दिया है। उन्होंने कहा कि सदन में इन विषयों पर न केवल चर्चा होनी चाहिए, बल्कि इनका प्रभावी और संतोषजनक समाधान भी निकलना चाहिए। उनके अनुसार, यदि मानसून सत्र भी हंगामे और बार-बार स्थगन की भेंट चढ़ गया, तो यह लोकतंत्र और देशवासियों के प्रति अन्याय होगा।
राम मंदिर से जुड़ी गड़बड़ियों पर गहरा आक्रोश
बसपा प्रमुख ने अयोध्या स्थित श्रीराम मंदिर में चढ़ावे की चोरी, हेराफेरी और गबन के आरोपों का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इन घटनाओं ने उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश की जनता के मन में गहरा आक्रोश पैदा किया है। लोग धर्म के राजनीतिकरण और चुनावी स्वार्थ के लिए हो रही इन गतिविधियों पर जवाबदेही मांग रहे हैं। यह मुद्दा आज सड़कों से लेकर अदालतों तक गूंज रहा है, और अब इसकी अनुगूंज संसद में भी सुनाई देना निश्चित है, जिस पर देश भर की नजरें टिकी हुई हैं।
महिला सुरक्षा और बिगड़ते प्रशासनिक हालात
मायावती ने विभिन्न राज्यों में बढ़ती महिला असुरक्षा पर भी कड़ी चिंता जताई। उन्होंने बंगाल में चुनाव के बाद की हिंसा और राजस्थान में सरकारी लापरवाही के चलते गर्भवती महिलाओं की मृत्यु जैसी घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि प्रशासनिक विफलताएं बढ़ रही हैं। उन्होंने सरकारी योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार, पुलिस मुठभेड़ों के बढ़ते चलन और बिना पूर्व सूचना के लोगों की बस्तियों को उजाड़ने वाली विध्वंसक कार्यवाहियों पर भी सवाल खड़े किए। बसपा सुप्रीमो ने कहा कि इस तरह के सरकारी रवैये ने संविधान द्वारा स्थापित जनकल्याणकारी व्यवस्था को कमजोर कर दिया है।
वैश्विक संकट और अर्थव्यवस्था का प्रभाव
अपनी बात को विस्तार देते हुए मायावती ने कहा कि केवल घरेलू मुद्दे ही नहीं, बल्कि वैश्विक परिस्थितियां भी भारत को प्रभावित कर रही हैं। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध और रुपये के अवमूल्यन का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था और जनजीवन पर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि इन चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में सत्ता और विपक्ष को संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठना होगा। यदि 140 करोड़ की आबादी वाला हमारा देश एक साथ होकर इन संकटों का मुकाबला नहीं करेगा, तो बहुजन समाज सहित समस्त भारतीयों का भविष्य और अधिक अंधकारमय हो जाएगा।
स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपराओं की अपेक्षा
अंत में मायावती ने आह्वान किया कि देश के कठिन सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक हालातों को ध्यान में रखते हुए संसद का मानसून सत्र शांतिपूर्ण और अनुशासित तरीके से चलना चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस सत्र से ‘गुड गवर्नेंस’ (सुशासन) की शुरुआत होगी, ताकि आम जनता के जीवन का बोझ कम हो सके। उन्होंने कहा कि संसद की संवेदनशीलता ही भारत के लोकतंत्र को और अधिक मजबूत बना सकती है।





















































