उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के सबसे चर्चित और हाई-प्रोफाइल मामलों में से एक, ‘इंद्र देव सिंह हत्याकांड’ में पूरे 24 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद आखिरकार अदालत का ऐतिहासिक फैसला आ गया है। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की विशेष अदालत ने लखनऊ बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता इंद्र देव सिंह की दिनदहाड़े की गई नृशंस हत्या के मामले में मंगलवार को अपना अंतिम फैसला सुनाया। अदालत ने इस सनसनीखेज वारदात को अंजाम देने वाले तीन मुख्य आरोपियों को दोषी करार देते हुए उम्रकैद (आजीवन कारावास) की कठोर सजा सुनाई है। इस फैसले के साथ ही न्यायपालिका ने स्पष्ट संदेश दिया है कि कानून के हाथ लंबे होते हैं और देर से ही सही, अपराधियों को उनके कर्मों की सजा भुगतनी ही पड़ती है।
इन तीन आरोपियों को मिली आजीवन कारावास की सजा
विशेष सीबीआई अदालत के न्यायाधीश वायु नंदन मिश्रा ने इस हत्याकांड की गहन सुनवाई और दोनों पक्षों की दलीलों को परखने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रखा था। अदालत ने मुख्य शूटर विक्रम यादव उर्फ कालिया, पन्ना सिंह और ब्रजेश कुमार यादव उर्फ मुन्ना को हत्या की मुख्य साजिश रचने तथा आपराधिक वारदात को अंजाम देने का सीधे तौर पर कसूरवार ठहराया। अदालत ने इन तीनों दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाने के साथ-साथ प्रत्येक अपराधी पर 30-30 हजार रुपये का आर्थिक अर्थदंड (जुर्माना) भी लगाया है। जुर्माने की राशि अदा न करने पर उन्हें अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।
अदालती कार्रवाई: दोषियों की जमानत रद्द कर भेजा गया जेल
इस बहुचर्चित मामले में कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए सीबीआई की विशेष अदालत ने बीते 30 जून को ही तीनों आरोपियों को विधिक रूप से दोषी घोषित कर दिया था। सीबीआई के विशेष लोक अभियोजक के.पी. सिंह ने मामले की विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि मुख्य शूटर विक्रम यादव उर्फ कालिया पहले से ही एक अन्य मामले में जेल की सलाखों के पीछे बंद था। वहीं, दो अन्य सह-आरोपी पन्ना सिंह और ब्रजेश कुमार यादव अब तक जमानत पर बाहर चल रहे थे। 30 जून को जैसे ही अदालत ने इन्हें दोषी ठहराया, वैसे ही दोनों की जमानत याचिकाएं तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दी गईं और उन्हें सजा की अवधि तय होने तक न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया था। इस लंबी कानूनी लड़ाई में मृत अधिवक्ता की पत्नी और मुख्य शिकायतकर्ता नयनतारा की ओर से वकील आर.के. यादव ने अदालती कार्यवाही के दौरान सीबीआई अभियोजन पक्ष की पैरवी में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कलेक्ट्रेट के पास दिनदहाड़े गोलियों से भून दिया गया था
यह खूनी खेल आज से करीब 24 साल पहले वर्ष 2002 में खेला गया था। अभियोजन पक्ष द्वारा अदालत में पेश किए गए दस्तावेजों के मुताबिक, 8 अगस्त 2002 को लखनऊ बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष इंद्र देव सिंह (जो नोएडा की वर्तमान पुलिस आयुक्त लक्ष्मी सिंह के पिता भी थे) कोर्ट के कामकाज को निपटाने के बाद अपने स्कूटर से घर वापस लौट रहे थे। इसी दौरान जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) कार्यालय के समीप घात लगाए बैठे हमलावरों ने उन पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसा दीं। कलेक्ट्रेट जैसे अति-सुरक्षित इलाके में दिनदहाड़े हुई इस हत्या से पूरी राजधानी और कानूनी बिरादरी हिल गई थी। वारदात के तुरंत बाद मृतक की पत्नी नयनतारा ने स्थानीय थाने में अज्ञात हमलावरों के खिलाफ हत्या की प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज कराई थी।
यूपी पुलिस से सीबीआई तक पहुंची जांच, ऐसे खुला राज
मामले के हाई-प्रोफाइल होने के कारण इसकी शुरुआती जांच उत्तर प्रदेश पुलिस ने की, लेकिन बाद में निष्पक्ष कार्रवाई के लिए केस को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के सुपुर्द कर दिया गया। सीबीआई की कड़ाई से की गई तफ्तीश में यह साफ हो गया कि वारदात के वक्त विक्रम यादव उर्फ कालिया ने ही इंद्र देव सिंह पर बिल्कुल करीब से गोलियां चलाई थीं, जबकि दूसरा दोषी ब्रजेश कुमार यादव उस स्कूटर को चला रहा था जिस पर सवार होकर हमलावर आए थे।
शुरुआती दौर में दर्ज कराई गई एफआईआर में सुरजन लाल वर्मा, डॉ. सुषमा वर्मा और सुरेश वर्मा को भी नामजद किया गया था, परंतु सीबीआई की गहन जांच में इन लोगों के खिलाफ कोई भी पुख्ता विधिक साक्ष्य या गवाह नहीं मिले, जिसके चलते इन्हें क्लीनचिट दे दी गई। वहीं, इस पूरी खूनी साजिश के मुख्य सूत्रधार माने जाने वाले तीन अन्य आरोपी वेद प्रकाश उर्फ नेता, मन्ना लाल गुप्ता और छोटे लाल की किस्मत का फैसला अदालत नहीं कर सकी, क्योंकि मुकदमे की लंबी सुनवाई के दौरान ही इन तीनों की अलग-अलग समय पर मौत हो गई थी।





















































