उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले से एक बेहद चौंकाने वाला और बड़ा भूमि घोटाला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। हसनपुर तहसील क्षेत्र के अंतर्गत नियमों को पूरी तरह ताक पर रखकर चरागाह, नदी, झील और तालाबों जैसी सार्वजनिक उपयोग की लगभग 2880 बीघा बेशकीमती सरकारी जमीन पर 500 से अधिक अवैध पट्टे आवंटित कर दिए गए। भू-माफिया और तत्कालीन राजस्व अधिकारियों व कर्मचारियों की मिलीभगत से करीब 37 साल पहले शुरू हुए इस काले खेल का भंडाफोड़ अब जाकर हुआ है। जिला प्रशासन ने मामले की गंभीरता को देखते हुए फौरन एक्शन लिया है और दोषियों के खिलाफ कानूनी शिकंजा कसना शुरू कर दिया है।
चकबंदी प्रक्रिया के दौरान खुला 37 साल पुराना राज
आधिकारिक सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, इस महा-घोटाले को वर्ष 1987 से लेकर 2000 के बीच अंजाम दिया गया था। दशकों तक फाइलों में दबा रहा यह राज तब बाहर आया, जब साल 2024 में क्षेत्र के गांवों में चकबंदी की प्रक्रिया शुरू की गई। चकबंदी विभाग की टीम ने जब राजस्व अभिलेखों और जमीनी हकीकत का मिलान करना शुरू किया, तो सरकारी कड़ियों में किए गए बड़े फर्जीवाड़े का पर्दाफाश हो गया। इस खुलासे के बाद से ही जिले के राजस्व महकमे में अफरा-तफरी का माहौल बना हुआ है। जिलाधिकारी के निर्देश पर अपर जिलाधिकारी (एडीएम) न्यायिक की अदालत ने अवैध पट्टों को रद्द करने की अदालती प्रक्रिया तेज कर दी है।
हसनपुर तहसील के इन 4 गांवों में हुआ अरबों का भूमि घोटाला
यह पूरा फर्जीवाड़ा मुख्य रूप से हसनपुर तहसील के चार अलग-अलग गांवों की जमीनों पर फैला हुआ है, जिनका विवरण इस प्रकार है:
- गंगेश्वरी: यहां सबसे ज्यादा करीब 1100 बीघा सार्वजनिक भूमि पर अवैध कब्जे और पट्टे दिए गए।
- रहरा: इस गांव में लगभग 1200 बीघा सरकारी जमीन को निजी हाथों में सौंपने का खेल हुआ।
- आदमपुर: यहां करीब 500 बीघा नदी-तालाबों की भूमि को खुर्द-बुर्द किया गया।
- दढ़ियाल: इस गांव में 80 बीघा जमीन पर अवैध तरीके से पट्टे काटे गए थे।
जिला शासकीय अधिवक्ता ने बताया कि इस मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए अब तक गंगेश्वरी और दढ़ियाल गांवों के अवैध पट्टों को पूरी तरह से निरस्त कर दिया गया है। इसमें दढ़ियाल गांव के 29 अवैध पट्टे भी शामिल हैं, जिन्हें करीब 7 महीने पहले ही खारिज किया जा चुका है। इन जमीनों को दोबारा सरकारी खाते में दर्ज कर उनके मूल स्वरूप में वापस ला दिया गया है। वहीं, रहरा और आदमपुर गांवों से जुड़े मामलों की न्यायिक अदालत में सुनवाई अभी जारी है, जिन पर जल्द ही फैसला आने की उम्मीद है। इसके अलावा, मंडी धनौरा क्षेत्र, गंगा नदी के खादर व डूब क्षेत्र और वन विभाग की जमीनों पर भी अवैध कब्जों की कई शिकायतें जिला प्रशासन के पास लंबित हैं, जिन पर जांच चल रही है।
सुप्रीम कोर्ट के कड़े निर्देश और राजस्व संहिता का उल्लंघन
जिला शासकीय अधिवक्ता (राजस्व) राजेश कुमार राणा ने इस मामले के कानूनी पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए बताया कि उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम 1950 और वर्तमान उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता की धारा 77 के तहत सार्वजनिक उपयोग की संपत्तियों का निजी आवंटन पूरी तरह प्रतिबंधित है। नदी, तालाब, झील, श्मशान या चरागाह की जमीनों को किसी भी स्थिति में निजी पट्टे पर नहीं दिया जा सकता।
वर्ष 2005 में देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने भी एक ऐतिहासिक फैसले में पारिस्थितिक संतुलन और पर्यावरण को बनाए रखने के लिए ऐसी सभी जमीनों को उनके मूल प्राकृतिक स्वरूप में बहाल करने के सख्त आदेश दिए थे। जिला प्रशासन इसी विधिक प्रक्रिया के तहत अवैध पट्टों को निरस्त करने की कार्रवाई को अंजाम दे रहा है।
जांच के रडार पर आएंगे उस दौर के तत्कालीन बड़े अफसर
इस महा-घोटाले की सबसे बड़ी कड़ियाँ उन अधिकारियों से जुड़ी हैं, जिनकी नाक के नीचे यह सब होता रहा। राजस्व विभाग के सूत्रों का कहना है कि इस गंभीर गड़बड़ी के लिए केवल अवैध पट्टाधारक ही कसूरवार नहीं हैं। असली खेल तो उन राजस्व कर्मियों ने किया, जिन्होंने जमीन की वास्तविक प्रकृति (नदी-तालाब) की जानकारी होने के बावजूद पैसों के लालच या दबाव में आकर सरकारी कागजातों में हेरफेर कर दिया।
इस विधिक जांच के दायरे में वर्ष 1987 से 2000 के बीच हसनपुर तहसील में तैनात रहे तत्कालीन लेखपाल, कानूनगो (राजस्व निरीक्षक), तहसीलदार और उपजिलाधिकारी (एसडीएम) आएंगे। इन सभी की भूमिका की गहनता से जांच की जा रही है और संलिप्तता पाए जाने पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। दूसरी तरफ, इस पूरे घटनाक्रम पर पक्ष जानने के लिए जब जिलाधिकारी डॉ. नितिन गौड़ और एसडीएम हसनपुर हिमांशु उपाध्याय से संपर्क करने का प्रयास किया गया, तो उनके फोन रिसीव नहीं हुए।





















































