उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज क्षेत्र में हुए भीषण अग्निकांड के घाव अभी भरे भी नहीं हैं कि प्रशासन ने इस त्रासदी के केंद्र बिंदु रही अवैध इमारत के खिलाफ सबसे बड़ा और कड़ा एक्शन ले लिया है। शनिवार की सुबह लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) का बुलडोजर उस चार मंजिला विवादास्पद इमारत पर गरज उठा, जिसके भीतर लगी भयंकर आग ने पिछले महीने 15 मासूम लोगों की जिंदगी छीन ली थी। इस उच्च-स्तरीय ध्वस्तीकरण कार्रवाई को शांतिपूर्ण और सुरक्षित तरीके से अंजाम देने के लिए पूरे इलाके को छावनी में तब्दील कर दिया गया था और भारी सुरक्षा बलों की तैनाती की गई थी।
छावनी में बदला इलाका, सुरक्षा के बीच शुरू हुआ ध्वस्तीकरण
शनिवार की सुबह जैसे ही एलडीए का अमला तीन भारी-भरकम बुलडोजर और हाइड्रोलिक मशीनों के साथ घटनास्थल पर पहुंचा, पूरे इलाके में हलचल मच गई। किसी भी संभावित विरोध या व्यवधान से निपटने के लिए प्रशासन ने पहले ही कमर कस ली थी। एहतियात के तौर पर दुर्घटना स्थल की ओर आने वाले सभी रास्तों पर कड़े अवरोधक (बैरिकेडिंग) लगा दिए गए और यातायात को पूरी तरह से रोक दिया गया। कानून-व्यवस्था की स्थिति नियंत्रण में रखने के वास्ते मौके पर सौ से अधिक पुलिस कर्मियों और पीएसी के जवानों को तैनात किया गया, ताकि ध्वस्तीकरण की यह प्रक्रिया बिना किसी बाधा के पूरी की जा सके।
कागजों में रेजिडेंशियल, धरातल पर चल रहा था कमर्शियल खेल
लखनऊ विकास प्राधिकरण के वरिष्ठ अधिकारियों ने इस पूरी कार्रवाई की पृष्ठभूमि स्पष्ट करते हुए बताया कि शुरुआती कागजातों में यह भवन केवल एक बेसमेंट और दो मंजिलों वाली आवासीय संरचना (रेजिडेंशियल स्ट्रक्चर) के रूप में स्वीकृत कराया गया था। परंतु, भवन स्वामियों ने नियमों को ताक पर रखते हुए इसमें न केवल एक अवैध अतिरिक्त मंजिल का निर्माण करवा लिया, बल्कि पूरे नक्शे के विपरीत जाकर इसे एक बड़े वाणिज्यिक प्रतिष्ठान में तब्दील कर दिया था।
घटना के तुरंत बाद, यानी 23 जून को ही एलडीए ने उत्तर प्रदेश शहरी नियोजन और विकास अधिनियम, 1973 के तहत विधिवत नोटिस जारी कर मालिकों से उनके निर्माण की वैधता के दस्तावेज मांगे थे। इसके बाद निर्धारित नियमों के तहत चली सुनवाई प्रक्रिया में नामित प्राधिकारी ने इस संपूर्ण वाणिज्यिक निर्माण को पूरी तरह से अवैध करार दे दिया। गत 10 जुलाई को इस इमारत को नेस्तनाबूद करने का अंतिम आदेश पारित किया गया था, जिसमें भवन स्वामियों को 25 जुलाई तक स्वयं ही अनधिकृत हिस्सों को हटाने की मोहलत दी गई थी। तय समय सीमा समाप्त होने के बाद आखिरकार प्राधिकरण ने खुद मोर्चा संभालते हुए इसे गिराने की कार्रवाई शुरू कर दी।
22 जून की वह खौफनाक रात, जब बुझ गए थे 15 घर के चिराग
यह वही मनहूस इमारत है जहां बीते 22 जून को एक दर्दनाक और दिल दहला देने वाला अग्निकांड हुआ था। इस बहुमंजिला भवन की दूसरी मंजिल पर एक कार्यालय और प्रशिक्षण केंद्र संचालित हो रहा था, जहां अचानक शॉर्ट सर्किट या अन्य कारणों से भीषण आग भड़क उठी। आग की विकराल लपटों और घने धुएं के बीच अंदर फंसे 15 लोगों की दम घुटने और झुलसने से मौत हो गई थी, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। उस भयावह मंजर के दौरान अपनी जान बचाने के लिए पांच अन्य लोगों ने हिम्मत दिखाते हुए दीवारों के सहारे लटक रहे बिजली के तारों और पानी के पाइपों के जरिए नीचे छलांग लगाई और किसी तरह अपनी जान बचाई थी।
प्रशासनिक लापरवाही पर गिरी थी गाज, चार गिरफ्तार और चार निलंबित
इस भीषण त्रासदी के सामने आने के बाद शासन और प्रशासन में हड़कंप मच गया था। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए मुख्य भवन स्वामी वीरेंद्र प्रसाद शुक्ला और संबंधित एनीमेशन सेंटर के संचालक समेत चार मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। इसके साथ ही, इस पूरी घटना के लिए जिम्मेदार विभिन्न विभागों की भारी लापरवाही को देखते हुए राज्य सरकार ने बिजली विभाग, अग्निशमन विभाग और लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) के चार भ्रष्ट अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया था। इस ध्वस्तीकरण की कार्रवाई को प्रशासन द्वारा अवैध निर्माणों के खिलाफ एक बड़ा और सख्त संदेश माना जा रहा है।





















































