उत्तर प्रदेश के बहाने असदुद्दीन ओवैसी पर कांग्रेस का तीखा हमला
देश की राजनीति में इन दिनों मुस्लिम नेतृत्व को लेकर जुबानी जंग तेज हो गई है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी द्वारा उत्तर प्रदेश में दिए गए एक बयान पर कांग्रेस पार्टी ने बेहद तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। तेलंगाना कांग्रेस इकाई के प्रमुख नेता मोहम्मद वलीउल्लाह समीर ने ओवैसी की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा है कि ओवैसी उत्तर प्रदेश के चुनावी मैदान में जिस नए राजनीतिक फार्मूले का राग अलाप रहे हैं, उसे उन्होंने अपने खुद के गृह राज्य और राजनीतिक गढ़ यानी तेलंगाना में कभी अमलीजामा क्यों नहीं पहनाया? कांग्रेस नेता के इस करारे वार से राजनीतिक हलकों में एक नई बहस छिड़ गई है।
‘उत्तर प्रदेश में सलाह और तेलंगाना में चुप्पी क्यों?’
हाल ही में ओवैसी ने अपने कई जनसभाओं और भाषणों के दौरान उत्तर प्रदेश के मुस्लिम समुदाय से अपील की थी कि वे अब पारंपरिक दलों जैसे कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी या अन्य नेताओं पर अपनी निर्भरता पूरी तरह खत्म कर दें। उन्होंने समुदाय से आह्वान किया था कि वे दूसरों के पिछलग्गू बनने के बजाय अपने ही भीतर से मजबूत और स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व तैयार करें।
इस पर तंज कसते हुए कांग्रेसी नेता मोहम्मद वलीउल्लाह समीर ने ओवैसी को कटघरे में खड़ा किया और कहा कि हैदराबाद के सांसद को पहले सार्वजनिक तौर पर यह स्पष्ट करना चाहिए कि दशकों से उनके प्रभाव वाले इलाकों में AIMIM ने अपने गढ़ से बाहर कितने स्वतंत्र मुस्लिम नेताओं को आगे बढ़ाया है। समीर ने ओवैसी के उस तंज पर पलटवार किया जिसमें उन्होंने ‘अब्दुल’ का जिक्र करते हुए दूसरों के लिए कालीन बिछाना बंद करने की बात कही थी। कांग्रेस नेता ने कड़े शब्दों में पूछा कि आजमगढ़ या रामपुर के मुसलमानों को यह ज्ञान देने से पहले ओवैसी को यह बताना चाहिए कि तेलंगाना में ‘अब्दुल’ की सियासी स्थिति क्या है और उसे चुनिंदा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं से बाहर निकलने से किसने रोक रखा है?
प्रतिनिधित्व की बात पर कोई दो राय नहीं, लेकिन नीयत पर सवाल
कांग्रेस नेता ने स्पष्ट किया कि इस पूरी बहस का यह कतई मतलब नहीं है कि मुस्लिम समुदाय को राजनीतिक प्रतिनिधित्व की आवश्यकता नहीं है। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि लोकतंत्र में हर वर्ग को उसकी आबादी के हिसाब से हिस्सेदारी मिलनी चाहिए। मुसलमानों को भी अधिक संख्या में विधायक, सांसद, मंत्री, महापौर, पार्षद और विभिन्न राजनीतिक दलों में बड़े पदों की सख्त जरूरत है।
असली विवाद इस बात को लेकर है कि क्या ओवैसी ने वास्तव में इस राजनीतिक प्रतिनिधित्व का दायरा बढ़ाया है या फिर उन्होंने अपनी राजनीति को एक खास और सीमित भौगोलिक क्षेत्र तक ही सीमित रखते हुए उस पर अपना व्यक्तिगत एकाधिकार जमा रखा है? समीर ने आरोप लगाया कि ओवैसी केवल भाषणों में मुस्लिम सशक्तीकरण का झंडा बुलंद करते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उन्होंने कभी ऐसा कोई गंभीर प्रयास नहीं किया जिससे उनके अपने राज्य में मजबूत मुस्लिम नेतृत्व का उदय हो सके।
दूसरे दलों के लिए सियासी जगह छोड़ने का आरोप
अपने तीखे बयान को आगे बढ़ाते हुए वलीउल्लाह समीर ने दो टूक कहा कि एक तरफ ओवैसी उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में जाकर मुस्लिम बस्तियों को दूसरों पर निर्भर न रहने की नसीहत देते हैं, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने खुद अपने गृह राज्य तेलंगाना में स्वेच्छा से अन्य राजनीतिक दलों के लिए सियासी मैदान खाली छोड़ दिया है। उन्होंने कहा कि कथनी और करनी के इस अंतर को जनता भली-भांति समझती है, और ओवैसी को पहले अपने घर में उस फार्मूले को लागू करके दिखाना चाहिए जिसकी सीख वे उत्तर प्रदेश की जनता को दे रहे हैं।















































