अस्पताल निर्माण के नाम पर दुकानदारों को हटाने पर उच्च न्यायालय की कड़ी फटकार
उत्तर प्रदेश के धार्मिक नगर अयोध्या में एक सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल के निर्माण के लिए व्यापारियों और दुकानदारों को बिना किसी विधिवत पुनर्वास योजना या मुआवजे के बलपूर्वक बेदखल किए जाने के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बेहद सख्त तेवर अपनाए हैं। न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने प्रशासन की इस कार्रवाई को आड़े हाथों लेते हुए इसे घोर निंदनीय करार दिया है। अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा है कि यद्यपि जनहित के कार्यों और स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार करना सरकार का दायित्व है, परंतु इसके नाम पर रोजी-रोटी चला रहे पट्टेदार दुकानदारों के संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी करके उन्हें बिना विकल्प के सड़क पर नहीं छोड़ा जा सकता। इस महत्वपूर्ण प्रकरण की अगली सुनवाई आगामी 16 नवंबर को मुकर्रर की गई है।
संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 का हो रहा खुला उल्लंघन
न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान इस बात पर विशेष जोर दिया कि जिन दुकानदारों के पास वैध पट्टे मौजूद हैं और जो कानूनी रूप से पट्टेदार का दर्जा रखते हैं, उनके पट्टों को बिना किसी विधिक प्रक्रिया के रद्द किए बिना ही परिसर खाली करने का दबाव बनाना पूरी तरह से अनुचित है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह की मनमानी कार्रवाई से नागरिकों के जीविकोपार्जन का मौलिक अधिकार सीधा प्रभावित होता है, जो कि भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 21 के प्रावधानों का खुला उल्लंघन है। अदालत ने माना कि विकास कार्य आवश्यक हैं, लेकिन वे कानून के दायरे में और प्रभावितों के हितों का ध्यान रखते हुए ही किए जाने चाहिए।
शासन से मांगा गया जवाब, सचिव स्तर के अधिकारी को सौंपना होगा हलफनामा
मामले की गंभीरता को देखते हुए उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग को कड़े निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने विभाग को आदेश दिया है कि वह आगामी तीन सप्ताह के भीतर अपना विस्तृत जवाबी हलफनामा दाखिल करे। इस हलफनामे में सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि अस्पताल निर्माण की इस परियोजना से प्रभावित होने वाले दुकानदारों के पुनर्वास या उन्हें वित्तीय मुआवजा देने के संबंध में प्रशासन द्वारा क्या ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया है कि यह हलफनामा किसी भी सूरत में सचिव स्तर से नीचे के अधिकारी द्वारा प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए, जिससे शासन की जवाबदेही तय की जा सके।
क्या है पूरा कानूनी विवाद और पट्टे का इतिहास?
यह पूरा कानूनी संघर्ष मोहम्मद नईम और पांच अन्य व्यापारियों की ओर से दायर की गई रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया है। याचियों के अधिवक्ताओं ने अदालत को अवगत कराया कि उन्हें वर्ष 2000 में सीतापुर नेत्र चिकित्सालय सोसायटी, फैजाबाद की तरफ से 3010 वर्षों के लंबे पट्टे पर दुकानें आवंटित की गई थीं। सभी आवश्यक कानूनी औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद 28 फरवरी 2000 को उन्हें इन दुकानों का वैध कब्जा सौंप दिया गया था।
नियमावली के नियमों के अनुसार इन पट्टों का हर 30 वर्ष की अवधि पूरी होने के बाद नवीनीकरण किए जाने का स्पष्ट प्रावधान है। इसके बावजूद अयोध्या के जिलाधिकारी ने पिछले वर्ष 26 जून 2025 को एक नोटिस जारी कर दुकानदारों को मात्र 15 दिनों के भीतर अपनी दुकानें खाली करने का फरमान सुना दिया। नोटिस में तर्क दिया गया कि वह पूरी भूमि और दुकानें चिकित्सा एवं परिवार कल्याण विभाग को ट्रांसफर की जा चुकी हैं। पूर्व में भी याचियों ने हाईकोर्ट की शरण ली थी, जिसके बाद अदालत ने यथास्थिति बनाए रखने के आदेश दिए थे। हालांकि, इसके बाद डीएम ने 31 जुलाई 2026 को नया आदेश पारित कर दिया कि सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल के लिए इस भूमि की सख्त जरूरत है और दुकानदारों का वहां काबिज रहने का कोई विधिक अधिकार नहीं बनता है, जिस पर अब उच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप किया है।











































