उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज इलाके में कुछ हफ्ते पहले हुए उस दर्दनाक अग्निकांड की यादें अभी भी ताजा हैं, जिसमें 15 मासूमों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। इसी बहुचर्चित और अवैध रूप से निर्मित चार मंजिला इमारत के खिलाफ लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) ने आखिरकार अपना सख्त शिकंजा कस दिया है। शनिवार को भारी प्रशासनिक अमले, पुलिस बल और अत्याधुनिक मशीनों की मौजूदगी में इस खतरनाक भवन को गिराने की विध्वंस कार्रवाई का श्रीगणेश किया गया। इस दौरान भवन मालिक के प्रतिनिधियों ने कार्रवाई के तौर-तरीकों पर तीखा विरोध भी दर्ज कराया।
भारी पुलिस छावनी में तब्दील हुआ इलाका, रोकी गई आवाजाही
शनिवार सुबह अलीगंज का वह क्षेत्र छावनी में तब्दील नजर आया, जहां यह भीषण दुर्घटना घटी थी। लखनऊ विकास प्राधिकरण के अधिकारी, कर्मचारी, बुलडोजर और हाइड्रोलिक मशीनों का बड़ा बेड़ा तय समय पर मौके पर पहुंच गया था। किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने और कानून-व्यवस्था पूरी तरह नियंत्रण में रखने के लिए चप्पे-चप्पे पर पुलिस बल तैनात किया गया। अभियान शुरू करने से ठीक पहले सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करते हुए आसपास के रास्तों को बैरिकेडिंग लगाकर पूरी तरह सील कर दिया गया और यातायात को डायवर्ट कर दिया गया। एलडीए के वरिष्ठ अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि भवन का निर्माण नियमों को ताक पर रखकर किया गया था और इसमें अग्नि सुरक्षा से जुड़े मानकों की भी भारी अनदेखी की गई थी, जिसके चलते इसे जमींदोज करने का कानूनी आदेश पारित किया गया था।
भवन स्वामी के पक्ष ने उठाया सवाल, अदालत जाने की चेतावनी
कार्रवाई के दौरान मौके पर पहुंचे भवन स्वामी वीरेंद्र शुक्ला के वकील राजेंद्र शुक्ला ने इस ध्वस्तीकरण पर गंभीर आपत्तियां दर्ज कराईं। उनका तर्क था कि प्रशासन की ओर से भवन स्वामी को निर्माण हटाने या जवाब देने के लिए 25 जुलाई तक की मोहलत दी गई थी, ऐसे में नियत समय से पहले शनिवार सुबह ही विध्वंस शुरू कर देना पूरी तरह से न्यायसंगत नहीं है। उनका यह भी दावा था कि उन्हें ध्वस्तीकरण का कोई अलग से फ्रेश ऑर्डर उपलब्ध नहीं कराया गया है और केवल पुराने नोटिस के आधार पर यह बलपूर्वक कार्रवाई की जा रही है।
कानूनी प्रक्रिया के पालन को लेकर भी दोनों पक्षों के बीच विवाद की स्थिति बनी रही। भवन स्वामी पक्ष का कहना था कि संबंधित कार्यालय बंद होने के कारण वे उच्चाधिकारियों के आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त नहीं कर सके, जिससे उनकी कानूनी चुनौती प्रभावित हुई है। इसी बात को लेकर शुक्रवार को वकीलों के एक धड़े ने कड़ा विरोध भी जताया था। हालांकि, एलडीए के अधिकारियों ने दो टूक शब्दों में कह दिया कि यदि प्राधिकरण को खुद यह ध्वस्तीकरण करना पड़ा, तो इस पूरी कार्रवाई में आने वाला भारी-भरकम खर्च भी संबंधित भवन स्वामी से ही वसूल किया जाएगा।
क्या था पूरा मामला? 22 जून की वह भयावह रात
यह वही कुख्यात इमारत है जिसमें बीते 22 जून को लगी भीषण आग ने 15 लोगों की जिंदगी छीन ली थी। हादसे के वक्त इस भवन की दूसरी मंजिल पर एक लाइब्रेरी और कोचिंग सेंटर संचालित हो रहा था, जहां बड़ी संख्या में छात्र पढ़ाई और प्रशिक्षण के लिए मौजूद थे। आग की लपटें इतनी भयानक थीं कि कई विद्यार्थियों ने पानी के पाइप और बिजली के तारों के सहारे लटककर अपनी जान बचाई, जबकि एक अन्य युवक जान बचाने की जद्दोजहद में ऊंचाई से नीचे कूद गया था जिसके कारण वह गंभीर रूप से घायल हो गया था।
इस মর্মান্তिक दुर्घटना के बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मामले को अत्यंत गंभीरता से लिया था। मुख्यमंत्री की सख्ती के बाद लापरवाही बरतने वाले विभिन्न विभागों के चार जिम्मेदार अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया था। इसके साथ ही, पुलिस ने भवन के निर्माण और सुरक्षा मानकों में घोर लापरवाही बरतने के आरोप में चार मुख्य आरोपियों के खिलाफ नामजद प्राथमिकी दर्ज करते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लिया था। शुरुआती जांच में यह बात खुलकर सामने आई थी कि उक्त इमारत में फायर सेफ्टी के कोई पुख्ता इंतजाम नहीं थे और निर्माण में भी भारी पैमाने पर नियमों की धज्जियां उड़ाई गई थीं।





















































