ग्लोबल वार्मिंग और रिकॉर्डतोड़ पारे की मार झेल रहे हिंदुस्तान के लिए एक ऐसी वैज्ञानिक रिपोर्ट सामने आई है, जिसने सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के होश उड़ा दिए हैं। एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में दावा किया गया है कि भारत में मात्र एक दिन की भीषण गर्मी 3,400 से अधिक लोगों की जान ले लेती है, वहीं अगर हीटवेव का यह दौर पांच दिनों तक खिंच जाए तो देश भर में मौतों का यह आंकड़ा 30,000 के खौफनाक स्तर को पार कर जाता है।
बर्कले के वैज्ञानिकों का शोध: आखिर क्यों सुलभ नहीं थे आंकड़े?
भारत में हर साल गर्मियों के मौसम में पारा 45 से 49 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, लेकिन इससे होने वाले जानी नुकसान की सटीक तस्वीर कभी सामने नहीं आ पाती थी। इस बड़ी कमी को दूर करने के लिए अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय (बर्कले) के ‘इंडिया एनर्जी एंड क्लाइमेट सेंटर’ के प्रमुख शोधकर्ताओं– पीयूष नारंग और अशोक गाडगिल ने एक विस्तृत रिसर्च की है।
शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन और गर्मी से संबंधित मृत्यु दर (Mortality Rate) पर कई अध्ययन हुए हैं, लेकिन भारत के जमीनी स्तर यानी जिलावार आंकड़ों का विस्तृत विश्लेषण आम तौर पर सुलभ नहीं था। इस कमी के कारण प्रशासन हीटवेव की गंभीरता को भांपने और समय रहते ‘हीट एक्शन प्लान’ तैयार करने में चूक जाता था।
क्या होती हैं ‘अतिरिक्त मौतें’ और कैसे हुआ इसका आकलन?
‘फ्रंटियर्स इन एनवायरनमेंटल हेल्थ’ नामक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने एक खास वैज्ञानिक पैमाने का उपयोग किया है, जिसे ‘अतिरिक्त मौतें’ (Excess Deaths) कहा जाता है। पब्लिक हेल्थ की भाषा में यह वह मापदंड है, जो किसी विशेष समयावधि (जैसे भीषण गर्मी का दौर) में हुई कुल मौतों और पुराने सामान्य आंकड़ों के आधार पर होने वाली अनुमानित मौतों के बीच के अंतर को दर्शाता है।
इस टीम ने भारत के 10 प्रमुख बड़े शहरों में गर्मी से होने वाली मौतों पर हुए एक बहु-शहरी अध्ययन के निष्कर्षों को आधार बनाया। इसके बाद, देश की नागरिक पंजीकरण प्रणाली (Civil Registration System) के जिला-स्तरीय आधिकारिक मृत्यु दर के आंकड़ों और साल 2024 की अनुमानित जनसंख्या को आपस में जोड़कर देश के सभी जिलों के लिए एक व्यापक मॉडल तैयार किया गया। इस मॉडल के जरिए एक दिन और पांच दिनों के दौरान भीषण गर्मी से जिलों में होने वाली अतिरिक्त मौतों का जो खाका खींचा गया, वह बेहद डरावना है।
आधा हिंदुस्तान तप रहा, उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा मातम
वर्तमान समय में उत्तर, मध्य और पूर्वी भारत के बड़े हिस्से में सूरज की आग बरस रही है। मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और हरियाणा के कई इलाकों में तापमान लगातार 45 डिग्री सेल्सियस के पार बना हुआ है। इस शोध के जिलावार विश्लेषण से पता चलता है कि अकेले उत्तर प्रदेश राज्य में पांच दिनों की भीषण गर्मी के भीतर लगभग 8,100 अतिरिक्त मौतें हो जाती हैं।
इसके अलावा, शहरी आबादी वाले बड़े औद्योगिक और व्यापारिक जिलों जैसे अहमदाबाद, जयपुर और सूरत में से प्रत्येक में सिर्फ एक बार की भीषण गर्मी के दौर (Heatwave Spell) में 250 से अधिक लोगों की जान चली जाती है। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो चुके शहर कैसे ‘अर्बन हीट आइलैंड’ बन रहे हैं।
गरीब राज्य झेल रहे कुदरत की सबसे बड़ी मार: जीडीपी बनाम मृत्यु दर
इस शोध का सबसे आंखें खोलने वाला पहलू सामाजिक और आर्थिक असंतुलन से जुड़ा है। अध्ययन में पाया गया कि सबसे अधिक मृत्यु भार झेलने वाले देश के पांच प्रमुख राज्यों– उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में स्वास्थ्य संकट और उनकी आर्थिक क्षमता के बीच 2.3 गुना का भारी असंतुलन है।
ये पांच राज्य मिलकर पूरे देश में भीषण गर्मी के कारण होने वाली कुल अतिरिक्त मौतों के 66 प्रतिशत हिस्से के लिए जिम्मेदार हैं। इसके विपरीत, भारत की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में इन राज्यों का संयुक्त योगदान केवल 29 प्रतिशत है। इसका सीधा मतलब यह है कि देश के आर्थिक रूप से कमजोर और घनी आबादी वाले मैदानी इलाके जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापमान में वृद्धि की सबसे भीषण और घातक कीमत चुका रहे हैं।
सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरे की घंटी: अब क्या हैं विकल्प?
विशेषज्ञों का कहना है कि यह रिपोर्ट भारत के नीति-निर्माताओं के लिए एक गंभीर चेतावनी है। केवल तापमान की घोषणा कर देना या ‘लू’ का अलर्ट जारी कर देना काफी नहीं है। जब तक ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों और जिला अस्पतालों में हीट स्ट्रोक के मरीजों के लिए विशेष वार्ड, चौबीस घंटे बिजली, और ओआरएस (ORS) जैसी बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित नहीं की जाएंगी, तब तक इन मौतों को रोकना असंभव होगा। इसके अलावा, शहरी नियोजन में बदलाव, हरित क्षेत्र (Green Cover) को बढ़ाना और जल निकायों का संरक्षण करना अब विलासिता नहीं, बल्कि जीवन बचाने के लिए अनिवार्य जरूरत बन चुका है।
यह वैश्विक रिपोर्ट इस कड़वे सच को उजागर करती है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का कोई खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान की एक जानलेवा हकीकत बन चुका है जो हर दिन हजारों भारतीयों को खामोशी से मौत की नींद सुला रहा है। 3,400 दैनिक मौतों का यह आंकड़ा किसी युद्ध या महामारी से कम नहीं है। समय आ गया है कि देश में भीषण गर्मी को एक प्राकृतिक आपदा के रूप में आधिकारिक तौर पर अधिसूचित किया जाए और जिला स्तर पर युद्ध स्तर पर जीवन रक्षक नीतियां लागू की जाएं, ताकि हमारे नागरिक इस अदृश्य कातिल का शिकार होने से बच सकें।



















































