उत्तर प्रदेश में अवैध घुसपैठ और उसके जरिए संचालित हो रहे संदिग्ध वित्तीय तंत्र के खिलाफ केंद्रीय जांच एजेंसी ने एक बेहद सख्त कदम उठाया है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की लखनऊ जोनल टीम ने धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत एक बड़ी कार्रवाई को अंजाम देते हुए उत्तर प्रदेश के साथ-साथ कुछ अन्य महत्वपूर्ण राज्यों में एक साथ छापेमारी की है। मिली जानकारी के अनुसार, केंद्रीय टीम ने कुल 13 अलग-अलग ठिकानों पर धावा बोलकर इस पूरे सिंडिकेट से जुड़े दस्तावेजों और वित्तीय लेन-देन की पड़ताल शुरू कर दी है। यह पूरा मामला करीब दो वर्ष पुराना बताया जा रहा है, जो देश की आंतरिक सुरक्षा, जाली दस्तावेजों के निर्माण और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय साठगांठ से जुड़ा हुआ है।
यूपी एटीएस की जांच से खुला था राज, अब ईडी ने संभाली कमान
इस बड़े रैकेट की शुरुआत सबसे पहले उत्तर प्रदेश की आतंकवाद निरोधक शाखा (यूपी एटीएस) द्वारा दर्ज की गई एक प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) से हुई थी। एटीएस ने अपनी शुरुआती जांच में एक ऐसे बेहद सक्रिय और संगठित आपराधिक गिरोह का पर्दाफाश किया था, जो मुख्य रूप से बांग्लादेशी नागरिकों और रोहिंग्याओं को अवैध रूप से भारतीय सीमा में प्रवेश करवाता था। यह सिंडिकेट न केवल देश में अवैध घुसपैठ करवा रहा था, बल्कि इन विदेशी नागरिकों को भारत में स्थाई रूप से बसाने के लिए उनके फर्जी आधार कार्ड, वोटर आईडी और अन्य भारतीय पहचान पत्र भी तैयार करवा रहा था। जब मामले में बड़े पैमाने पर अवैध वित्तीय लेन-देन और हवाला नेटवर्क के सबूत सामने आए, तो गंभीरता को देखते हुए प्रवर्तन निदेशालय ने प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत मामला दर्ज कर जांच की कमान अपने हाथों में ले ली।
चैरिटेबल ट्रस्ट और ‘म्यूल अकाउंट्स’ के जरिए विदेशी फंडिंग का खेल
प्रवर्तन निदेशालय के वरिष्ठ अधिकारियों से मिली आधिकारिक जानकारी के अनुसार, अब तक की गई शुरुआती तफ्तीश में एक बेहद जटिल और गहरे वित्तीय नेटवर्क का खुलासा हुआ है। जांच में यह बात सामने आई है कि कुछ तथाकथित चैरिटेबल ट्रस्टों और गैर-सरकारी संस्थाओं को विदेशों से भारी मात्रा में चंदा (फंडिंग) मिल रहा था। इस प्राप्त विदेशी धन का उपयोग कथित तौर पर देश विरोधी और अवैध गतिविधियों को गति देने के लिए किया जा रहा था। केंद्रीय एजेंसी को अंदेशा है कि पकड़े जाने से बचने के लिए शातिर अपराधियों ने कई बैंक खातों, फर्जी नाम पर खोले गए ‘म्यूल अकाउंट्स’ (दूसरों के नाम पर संचालित खाते) और बहुस्तरीय लेन-देन प्रक्रियाओं (लेयरिंग) का सहारा लिया, ताकि पैसे के मुख्य स्रोत का पता न लगाया जा सके।
नकद निकासी और छोटे ट्रांजैक्शन से पैसों का हेरफेर
जांच में इस बात के भी पुख्ता सबूत मिले हैं कि संदिग्धों को पैसे ट्रांसफर करने के लिए एक बेहद सोची-समझी रणनीति अपनाई गई थी। बैंकिंग रडार से बचने के लिए बड़ी रकम को सीधे ट्रांसफर करने के बजाय, बैंक खातों से भारी मात्रा में नकद निकासी की गई और फिर उसे बेहद छोटी-छोटी किश्तों में अलग-अलग व्यक्तियों के खातों में भेजा गया। इस रणनीति का मुख्य उद्देश्य वित्तीय खुफिया एजेंसियों को गुमराह करना था। फिलहाल, ईडी की टीमें जब्त किए गए डिजिटल उपकरणों, बैंक पासबुक और अन्य दस्तावेजों की गहनता से पड़ताल कर रही हैं और इस रैकेट के मास्टरमाइंड्स तक पहुंचने के लिए कार्रवाई को आगे बढ़ाया जा रहा है।





















































