उत्तर प्रदेश की राजनीति में गठबंधन की सुगबुगाहट शुरू
आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के मद्देनजर सूबे की सियासत में पारा अचानक चढ़ गया है। भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से बेदखल करने के लिए विपक्षी दलों ने अभी से अपनी रणनीतिक चालें चलनी शुरू कर दी हैं। इसी कड़ी में मुख्य विपक्षी खेमे में सीट बंटवारे को लेकर बैठकों और वार्ताओं का दौर आरंभ हो गया है। कांग्रेस पार्टी ने अपने सहयोगी दल समाजवादी पार्टी के समक्ष सीटों की जो प्राथमिक फेहरिस्त पेश की है, उसने राजनीतिक गलियारों में खासी चर्चा छेड़ दी है। राज्य में चुनावी समीकरणों को अपने पक्ष में करने के लिए कांग्रेस ने एक मजबूत और निर्णायक हिस्सेदारी की मांग उठाई है।
कांग्रेस की बड़ी डिमांड: 175 से 200 सीटों पर नजर
विश्वसनीय सूत्रों और पार्टी के उच्च पदस्थ पदाधिकारियों के मुताबिक, कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी को लगभग 175 से 200 विधानसभा सीटों की एक लंबी सूची सौंपी है। पार्टी का मानना है कि इन क्षेत्रों में उसका सांगठनिक प्रभाव और चुनावी पकड़ मजबूत है, जिसके बूते वह गठबंधन को जीत की दहलीज तक पहुंचाने में अहम भूमिका अदा कर सकती है।
कांग्रेस के उत्तर प्रदेश मामलों के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने इस संबंध में प्रतिक्रिया देते हुए स्पष्ट किया कि इस संभावित सूची को कुछ समय पहले सपा के प्रमुख नेताओं के साथ साझा किया जा चुका है। हालांकि उन्होंने सीधे तौर पर किसी एक अंतिम आंकड़े की पुष्टि करने से परहेज किया, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया कि पार्टी ने 175 से 200 सीटों का प्रस्ताव रखा है। आने वाले दिनों में दोनों दलों के शीर्ष नेता एक मेज पर बैठकर इन तमाम चुनावी सीटों की नफा-नुकसान और जीत की संभावनाओं पर विस्तार से मंथन करेंगे।
अखिलेश यादव का बड़ा बयान: ‘जीत की क्षमता ही पैमाना’
दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी ने इस भारी-भरकम मांग पर अपनी शुरुआती प्रतिक्रिया में साफ कर दिया है कि राजनीति में केवल दावे करने से बात नहीं बनती, बल्कि जमीन पर उतरकर ठोस रणनीति बनानी होती है। सपा के एक वरिष्ठ रणनीतिकार का मानना है कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव पहले ही यह बात स्पष्ट कर चुके हैं कि सीटों के आवंटन का एकमात्र और सर्वोपरि आधार केवल ‘जीत की क्षमता’ यानी विनिंग कैपेसिटी ही होगा। इसलिए कोई भी दल अपनी दावेदारी पेश कर सकता है, लेकिन अंततः एक व्यावहारिक और सार्थक समाधान तक पहुंचने के लिए औपचारिकता से ऊपर उठना होगा।
शुक्रवार को पत्रकारों से मुखातिब होते हुए सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने गठबंधन की मजबूती पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और पूरे इंडिया गठबंधन को जमीनी स्तर पर और अधिक सशक्त बनाने की जरूरत है। अखिलेश ने दो टूक शब्दों में दोहराया कि उनका और उनके सहयोगियों का एकमात्र और साझा मकसद भारतीय जनता पार्टी को उत्तर प्रदेश की सत्ता से बाहर करना है। जनता को जागरूक करके और भगवा दल की नीतियों के खिलाफ प्रभावी माहौल बनाकर वे इस लक्ष्य को जरूर हासिल करेंगे।
लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजे बने टॉनिक
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस के तेवर अचानक इतने मुखर क्यों हुए हैं, इसके पीछे हालिया लोकसभा चुनाव के नतीजे हैं। साल 1989 के बाद से उत्तर प्रदेश में लगातार कमजोर होते जनाधार और 2022 के विधानसभा चुनाव में महज दो सीटों पर सिमट जाने वाली कांग्रेस के लिए 2024 का आम चुनाव संजीवनी साबित हुआ। समाजवादी पार्टी के साथ हुए पिछले गठबंधन के तहत लड़ी गई सीटों पर कांग्रेस ने बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए सूबे में छह लोकसभा सीटों पर शानदार जीत दर्ज की थी, जबकि सपा ने 37 सीटों पर परचम लहराया था।
राजेंद्र पाल गौतम का तर्क है कि लोकसभा चुनाव के इन आंकड़ों ने यह साबित कर दिया है कि यदि दोनों दल एकजुट होकर मैदान में उतरते हैं, तो चुनावी परिणामों पर इसका गहरा और सकारात्मक असर पड़ता है। यही वजह है कि कांग्रेस इस बार विधानसभा चुनाव में किसी भी प्रकार के समझौते के मूड में नहीं है और सम्मानजनक सीटों के साथ चुनावी वैतरणी पार करने की पुरजोर उम्मीद लगाए बैठी है।











































