लखनऊ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राष्ट्र की अखंडता और सामाजिक एकजुटता पर जोर देते हुए स्पष्ट किया है कि भारत की असली पहचान आंतरिक संघर्ष में नहीं, बल्कि ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ के संकल्प में निहित है। उन्होंने कहा कि संकीर्ण जातीय खेमों, भाषाई विवादों अथवा क्षेत्रीय सीमाओं में देश को बांटने की चेष्टा वास्तव में राष्ट्र और भारत माता के प्रति गंभीर अपराध है। इतिहास का स्मरण कराते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि पराधीनता के कालखंड में भी समाज को विखंडित करने वाली और एकजुट करने वाली दो धाराएं सक्रिय थीं; आज भी वही विभाजनकारी प्रवृत्तियां नए कलेवर में सिर उठा रही हैं। ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में शिक्षक समुदाय का यह प्राथमिक कर्तव्य बनता है कि वे इन विघटनकारी मंसूबों को किसी भी कीमत पर सफल न होने दें।
मुख्यमंत्री रविवार को राजधानी लखनऊ स्थित डॉ. राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के डॉ. भीमराव अंबेडकर सभागार में अखिल विश्व गायत्री परिवार के शताब्दी वर्ष समारोह के अंतर्गत आयोजित प्रांतीय शिक्षक गरिमा कार्यशाला में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे। दीप प्रज्ज्वलन और वैदिक गायत्री मंत्रोच्चार के साथ शुरू हुए इस गरिमामयी समारोह में उन्होंने शिक्षा, संस्कृति और पर्यावरण के अंतर्संबंधों पर अपने विचार साझा किए।
विचार शाश्वत रहते हैं, व्यक्ति-केंद्रित संगठन बिखर जाते हैं: मुख्यमंत्री
अखिल विश्व गायत्री परिवार के संस्थापक पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य एवं वंदनीया माता भगवती देवी को नमन करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि इस मिशन ने युग निर्माण योजना और पावन यज्ञीय परंपरा के माध्यम से समाज को समरसता के सूत्र में पिरोया है। उन्होंने कहा कि पंडित श्रीराम शर्मा चाहते तो संगठन को स्वयं के नाम से स्थापित कर सकते थे, परंतु उन्होंने व्यक्ति पूजा के स्थान पर उदात्त वैचारिक दर्शन को प्राथमिकता दी। इतिहास साक्षी है कि व्यक्ति के नाम पर खड़े किए गए संगठन समय के साथ बिखर जाते हैं, जबकि जनहितैषी विचार युगों-युगों तक मानवता का मार्गदर्शन करते हैं; गायत्री परिवार की एक सदी की अविरल साधना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।
मुख्यमंत्री ने ऐतिहासिक संदर्भ प्रस्तुत करते हुए बताया कि 1920 का दशक भारतीय जनचेतना के जागरण का स्वर्णिम काल था। वर्ष 1923 में गीता प्रेस, 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) तथा 1926 में अखिल विश्व गायत्री परिवार की स्थापना हुई। यद्यपि तीनों के कार्यक्षेत्र और शैलियां भिन्न थीं, किंतु तीनों का ध्येय एक था—जनचेतना को जाग्रत करना तथा समाज को सनातन संस्कृति, मानवीय मूल्यों और भारतबोध से जोड़ना।
गुरुकुल परंपरा का पुनरुद्धार और युवा शक्ति का मार्गदर्शन
शिक्षकों को राष्ट्र का युग निर्माता और समाज की सजग चेतना बताते हुए मुख्यमंत्री ने आह्वान किया कि यदि शिक्षक वर्ग अपने कर्तव्यों का निर्वहन पूरी निष्ठा और समर्पण से करे, तो भारत को पुनः विश्व गुरु के पद पर आसीन होने में तनिक भी विलंब नहीं होगा। उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन आचार्य और गुरुकुल व्यवस्था ने तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वप्रसिद्ध ज्ञान केंद्र दिए। इसी ज्ञान परंपरा की छत्रछाया में चाणक्य-चंद्रगुप्त, महर्षि वशिष्ठ-श्रीराम और महर्षि सांदीपनि-श्रीकृष्ण जैसी महान विभूतियां गढ़ी गईं। आज आवश्यकता इस बात की है कि उसी गौरवशाली शिक्षण परंपरा को आधुनिक युग में पुनः जीवंत किया जाए।
मुख्यमंत्री ने कहा कि भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा के माध्यम से 11 लाख से अधिक विद्यार्थियों का जुड़ना एक युगांतरकारी कदम है। यदि हम नई पीढ़ी को सही दिशा, मूल्यपरक शिक्षा और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के योग्य बनाएंगे, तो यही युवा शक्ति 2047 के विकसित भारत की सबसे बड़ी संवाहक और भाग्य विधाता बनेगी।
संयुक्त परिवारों का संरक्षण और पर्यावरण संतुलन
सामाजिक ताने-बाने पर चिंता व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि संयुक्त परिवार सदैव से भारतीय समाज की रीढ़ और आंतरिक शक्ति रहे हैं। परिवारों के एकाकी होने से मानसिक तनाव और बिखराव जैसी विसंगतियां बढ़ी हैं। अतः गायत्री परिवार जैसे आध्यात्मिक संगठनों को समाज के साथ-साथ बिखरते परिवारों को भी प्रेम और संस्कार के सूत्र में बांधना होगा। उन्होंने रेखांकित किया कि जब प्रकृति किसी जीव से भेदभाव नहीं करती, तो मानवीय समाज में भी छुआछूत या भेदभाव का कोई स्थान नहीं होना चाहिए।
पर्यावरण संरक्षण के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता दोहराते हुए मुख्यमंत्री ने विवरण दिया कि प्रदेश में 2017 से 2026 की अवधि में 275 करोड़ पौधे रोपे गए हैं, जिनमें से अकेले इस वर्ष 35 करोड़ पौधों का रोपण हुआ। उन्होंने कहा कि केवल पौधारोपण पर्याप्त नहीं, बल्कि उनकी निरंतर निगरानी और संरक्षण की पुख्ता व्यवस्था भी की गई है। नदियों को मानव शरीर की प्राणदायी धमनियों की संज्ञा देते हुए उन्होंने जलस्रोतों को अविरल, निर्मल और प्रदूषण मुक्त बनाए रखने पर विशेष बल दिया।
स्वाधीनता के शताब्दी वर्ष का संकल्प और उत्कृष्ट विद्यालयों का सम्मान
मुख्यमंत्री ने देशवासियों से आह्वान किया कि स्वाधीनता के शताब्दी वर्ष (2047) तक देश को आत्मनिर्भर और विकसित बनाने के लिए हमें औपनिवेशिक मानसिकता को तिलांजलि देनी होगी, अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करना होगा और अधिकारों से बढ़कर राष्ट्रीय कर्तव्यों को प्राथमिकता देनी होगी। जब नागरिक अपने दायित्वों के प्रति सजग होंगे, तो विश्व की कोई भी ताकत भारत के विकास रथ को रोक नहीं सकेगी। उन्होंने गायत्री परिवार से आगामी 100 वर्षों के लिए विस्तृत कार्ययोजना तैयार करने का आग्रह किया।
समारोह में भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले शीर्ष 10 विद्यालयों को सम्मानित किया गया। सम्मानित शिक्षण संस्थानों में सीतापुर इंटर कॉलेज व आशुतोष बृजभवन लाल इंटर कॉलेज (सीतापुर), चंद्रशेखर मेमोरियल पब्लिक स्कूल (रायबरेली), लखनऊ पब्लिक स्कूल व सिटी मॉन्टेसरी स्कूल (लखनऊ), डॉ. केएन मोदी साइंस एंड वाणिज्य इंटर कॉलेज (गाजियाबाद), शिव प्रताप इंटर कॉलेज (अमेठी), अमर सिंह इंटर कॉलेज (बुलंदशहर), चित्रकूट इंटर कॉलेज (चित्रकूट) तथा एमजी पब्लिक स्कूल (मुजफ्फरनगर) शामिल रहे।
कार्यक्रम में उपस्थित विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने विचार रखते हुए कहा कि मुख्यमंत्री के नेतृत्व में प्रदेश के शिक्षा बजट में ऐतिहासिक वृद्धि हुई है, ड्रॉपआउट दर में उल्लेखनीय कमी आई है, मेरिट आधारित पारदर्शी शिक्षक भर्तियां संपन्न हुई हैं तथा परिषदीय विद्यालयों में स्मार्ट कक्षाओं की स्थापना से बुनियादी ढांचे का कायाकल्प हुआ है। वहीं अखिल विश्व गायत्री परिवार के प्रतिनिधि डॉ. चिन्मय पंड्या ने कहा कि आज आंतरिक काम, क्रोध, लोभ और स्वार्थ ही व्यक्ति के समक्ष सबसे बड़ी चुनौतियां हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि नीति, न्याय, धर्म और सदाचार की स्थापना के जरिए ही नई पीढ़ी को सांस्कृतिक पतन से बचाया जा सकता है, जो कि भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा का मूल उद्देश्य है।




















































