प्रयागराज उत्तर प्रदेश की ग्रामीण राजनीति और स्थानीय स्वशासन को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों के आयोजन को लेकर स्पष्ट निर्देश जारी करते हुए पूरी चुनावी प्रक्रिया को आगामी तीन माह की निर्धारित समय-सीमा के भीतर संपन्न कराने का आदेश दिया है। इस न्यायिक आदेश के बाद सूबे के ग्रामीण अंचलों में चुनावी सरगर्मियां तेज हो गई हैं, साथ ही राज्य निर्वाचन आयोग को तय वक्त में सभी आवश्यक चुनावी तैयारियां पूरी करने का कड़ा संदेश मिला है।
डिवीजन बेंच ने तय की 90 दिनों की डेडलाइन
यह ऐतिहासिक निर्णय इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अजीत कुमार एवं न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की संयुक्त खंडपीठ ने सुनाया। अदालत में दाखिल याचिका के जरिए मांग उठाई गई थी कि जिला पंचायतों का विधिवत कार्यकाल समाप्त होने से पूर्व ही पूरी निर्वाचन प्रक्रिया को अंजाम दिया जाना चाहिए। इसके लिए राज्य निर्वाचन आयोग को अदालत के समक्ष एक स्पष्ट, सुव्यवस्थित और समयबद्ध चुनावी कार्यक्रम का ब्योरा प्रस्तुत करने के निर्देश देने की गुहार लगाई गई थी। खंडपीठ ने इस विषय की गंभीरता को स्वीकारते हुए स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत स्थानीय निकायों का गठन बिना किसी अनुचित विलंब के तीन महीने के भीतर सुनिश्चित किया जाए।
ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने के निर्णय पर अदालत की मुहर
चुनाव की समय-सीमा तय करने के साथ ही उच्च न्यायालय ने उन अर्जियों को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिनमें निवर्तमान ग्राम प्रधानों को अंतरिम प्रशासक के रूप में नियुक्त करने के सरकारी कदम की वैधता को चुनौती दी गई थी। अदालत ने स्थिति स्पष्ट करते हुए व्यवस्था दी कि जब तक नए चुनाव संपन्न नहीं हो जाते, तब तक वर्तमान ग्राम प्रधान ही अपने-अपने क्षेत्रों में बतौर प्रशासक प्रशासनिक और विकास कार्यों की कमान संभालते रहेंगे। इसका सीधा तात्पर्य यह है कि आने वाले तीन महीनों की अवधि तक पंचायतों की बागडोर निवर्तमान प्रधानों के हाथों में ही सुरक्षित रहेगी।
ओबीसी आरक्षण और आयोग की स्थिति पर स्थिति साफ
ओबीसी आरक्षण और आयोग के संदर्भ में उठ रहे सवालों का समाधान करते हुए खंडपीठ ने निर्देश दिया कि पिछड़ा वर्ग आयोग अपनी जांच और आवश्यक समीक्षा का कार्य स्वतंत्र रूप से जारी रखेगा। अदालत ने साफ किया कि आयोग के कामकाज से चुनावी तंत्र की गति नहीं रुकेगी और निर्वाचन की औपचारिक प्रक्रिया आयोग की अंतिम रिपोर्ट पर आश्रित नहीं रहेगी। चुनाव का संचालन वर्तमान में प्रभावी नियमावली और वैधानिक ढांचे के अनुसार ही होगा, जिसमें अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए निर्धारित 27 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान का पूर्णतः अनुपालन सुनिश्चित किया जाएगा।

















































