यमुना के डूब क्षेत्र में बसी अनधिकृत बस्तियों के खिलाफ शासन की कड़ी नीति के बाद अब जमीनी स्तर पर एक बड़ा सामाजिक और प्रशासनिक टकराव खड़ा हो गया है। उत्तर प्रदेश सरकार के कड़े दिशा-निर्देशों के बाद पावर कॉरपोरेशन ने ताबड़तोड़ कार्रवाई करते हुए डूब क्षेत्र के इलाकों से 13,000 से अधिक विद्युत कनेक्शन विच्छेदित कर दिए हैं। इस सख्त कदम के चलते हजारों परिवारों के घरों में अचानक अंधेरा छा गया है, जिससे रोजमर्रा का जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है। भीषण उमस और बुनियादी जरूरतों के बीच बिजली काटे जाने से उपजे जन-आक्रोश ने अब व्यापक आंदोलन की शक्ल ले ली है, जिसके मद्देनजर रविवार को एक विशाल महापंचायत बुलाने का निर्णय लिया गया है।
अचानक बिजली कटने से बिगड़े हालात, बच्चों की पढ़ाई और पानी पर संकट
विद्युत आपूर्ति बंद होने से डूब क्षेत्र में बसे हजारों परिवारों के सामने गंभीर मानवीय संकट खड़ा हो गया है। भीषण गर्मी के दौर में बिजली गुल होने से पेयजल आपूर्ति की मोटरें ठप पड़ गई हैं, जिससे पीने के साफ पानी की भारी किल्लत हो गई है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि स्कूली बच्चों की परीक्षाएं और दैनिक अध्ययन कार्य पूरी तरह पटरी से उतर चुका है, वहीं छोटे दुकानदारों, कामकाजी महिलाओं और घरेलू गतिविधियों पर सीधा प्रहार हुआ है। प्रभावित नागरिकों का तर्क है कि बिना किसी पूर्व सूचना अथवा वैकल्पिक व्यवस्था के बुनियादी मानवीय सुविधाओं को एकाएक छीन लेना अनुचित और अमानवीय है।
जनप्रतिनिधियों ने उठाई मांग: ‘मूलभूत सुविधाओं पर पाबंदी समाधान नहीं’
बिजली विभाग की इस सख्त कार्रवाई के बाद स्थानीय जनप्रतिनिधि भी खुलकर रहवासियों के समर्थन में उतर आए हैं। नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने शासन और विद्युत निगम के वरिष्ठ अधिकारियों से तत्काल प्रभाव से बिजली बहाली की गुहार लगाई है। जनप्रतिनिधियों का कहना है कि यदि डूब क्षेत्र में अनधिकृत निर्माण की कोई समस्या है, तो उसके लिए विधिक व प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत दीर्घकालिक समाधान तलाशा जाना चाहिए। दशकों से रह रहे आम नागरिकों को बिजली और पानी जैसी अत्यंत अनिवार्य सुविधाओं से महरूम करना समस्या का स्थायी और न्यायसंगत हल कभी नहीं हो सकता।
किसानों का समर्थन और रविवार को निर्णायक महापंचायत की तैयारी
अब इस पूरे प्रकरण में स्थानीय किसान संगठनों ने भी हस्तक्षेप करने का फैसला कर लिया है। किसानों के समर्थन के साथ इस विरोध प्रदर्शन को बड़े आंदोलन में बदलने की तैयारी पूरी कर ली गई है। इसी क्रम में रविवार को एक संयुक्त महापंचायत का आह्वान किया गया है, जिसमें हजारों प्रभावित नागरिकों के साथ किसान प्रतिनिधि जुटेंगे। इस महापंचायत में बिजली संकट, बस्तियों के अस्तित्व और प्रशासनिक सख्ती से निपटने के लिए एक संयुक्त रणनीति तय की जाएगी। बैठक के बाद प्रशासन के खिलाफ बड़े पैमाने पर धरना-प्रदर्शन और घेराव की रूपरेखा भी तैयार की जा सकती है, जिससे आने वाले दिनों में यह विवाद और अधिक सियासी रंग ले सकता है।
बाढ़ और सुरक्षा को लेकर सख्त रुख पर अड़ा प्रशासन
दूसरी ओर, प्राधिकरण और जिला प्रशासन डूब क्षेत्र में अवैध निर्माण को लेकर अपने रुख पर पूरी तरह अडिग नजर आ रहा है। प्रशासनिक अधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि यमुना के खादर क्षेत्र में बिना वैधानिक स्वीकृति के हुआ निर्माण भविष्य में बड़े खतरे का सबब बन सकता है। मानसून के समय जलस्तर बढ़ने और बाढ़ की स्थिति में इन निचले इलाकों में जलभराव भारी जन-धन की हानि का कारण बनता है। प्रशासन का तर्क है कि अनियंत्रित बस्तियों के विस्तार को समय रहते रोकना पर्यावरण और स्वयं यहां रहने वाले लोगों की जीवन-सुरक्षा के लिहाज से बेहद जरूरी है।





















































