उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा स्थित राजकीय आयुर्विज्ञान संस्थान (GIMS – जिम्स) में पिछले कई दिनों से सुलग रही असंतोष की आग बुधवार को अचानक भड़क उठी। कासना स्थित इस प्रतिष्ठित अस्पताल में स्थायीकरण की मांग को लेकर आउटसोर्स कर्मचारियों का शांतिपूर्ण धरना देखते ही देखते एक बड़े बवाल में तब्दील हो गया। सोशल मीडिया पर एक वीडियो आग की तरह फैल रहा है जिसमें पुलिस और प्रदर्शनकारी कर्मचारियों के बीच तीखी नोकझोंक और भारी धक्का-मुक्की साफ देखी जा सकती है। एक तरफ जहां कर्मचारियों ने पुलिस पर बर्बरता और महिलाओं के साथ बदसलूकी के संगीन आरोप लगाए हैं, वहीं दूसरी ओर पुलिस और अस्पताल प्रशासन ने इन दावों को सिरे से खारिज करते हुए इसे मरीजों की जान बचाने की कवायद करार दिया है। इस पूरे घमासान के बीच सबसे ज्यादा फजीहत उन बेबस मरीजों की हुई, जो इलाज की आस में दूर-दराज से अस्पताल पहुंचे थे।
नियमितीकरण की मांग: 15 जून से सुलग रही थी चिंगारी
प्राप्त जानकारी के मुताबिक, जिम्स अस्पताल में लंबे समय से आउटसोर्सिंग के आधार पर काम कर रहे गैर-शैक्षणिक कर्मचारी 15 जून से ही अनिश्चितकालीन हड़ताल पर बैठे हुए हैं। इन कर्मचारियों की एकमात्र और प्रमुख मांग अपनी नौकरी का स्थायीकरण (Permanent Appointment) है। प्रदर्शनकारियों का स्पष्ट कहना है कि वे बीते कई वर्षों से, कोविड जैसी भयंकर महामारी से लेकर सामान्य दिनों तक, पूरी निष्ठा के साथ संस्थान में अपनी सेवाएं दे रहे हैं, लेकिन प्रबंधन उनके भविष्य को लेकर संजीदा नहीं है। नियमितीकरण न होने के कारण उनके भीतर भारी रोष पनप रहा था, जो अंततः उग्र आंदोलन के रूप में फूट पड़ा।
वार्ता रही बेनतीजा, वादे से मुकरने का आरोप
अस्पताल प्रशासन और पुलिस अधिकारियों ने इस पूरे मामले को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने की हरसंभव कोशिश की। बताया जा रहा है कि जिम्स के आला अधिकारियों, जिला प्रशासन और पुलिस महकमे ने मिलकर हड़ताली कर्मचारियों के साथ करीब 10 से 15 दौर की मैराथन बैठकें कीं। बुधवार को भी हालात को काबू में करने के लिए डीसीपी (DCP), एडीएम (ADM) और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने मोर्चा संभाला। लगभग पांच से छह घंटे तक चली इस लंबी जद्दोजहद और बातचीत के बाद, एक वक्त ऐसा आया जब लगा कि गतिरोध टूट गया है। प्रशासन का दावा है कि कर्मचारी प्रतिनिधियों ने धरना खत्म करने पर सहमति जता दी थी। लेकिन, कुछ ही देर बाद परिस्थितियां पलट गईं और कर्मचारियों ने अचानक अपना फैसला बदलते हुए प्रदर्शन को और तेज कर दिया।
ओपीडी ठप, आईसीयू में मरीजों की जान पर बनी
आंदोलन के उग्र होने का सबसे खौफनाक असर अस्पताल की स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ा। प्रबंधन के अनुसार, आक्रोशित कर्मचारियों ने मुख्य ओपीडी (OPD) गेट और मरीज पंजीकरण (Registration) काउंटर पर पूरी तरह से कब्जा जमा लिया। पर्चा बनवाने आए मरीजों और उनके तीमारदारों को भारी फजीहत का सामना करना पड़ा। स्थिति तब और ज्यादा भयावह हो गई जब आईसीयू (ICU) जैसी अति-संवेदनशील जगह पर तैनात कुछ नर्सिंग स्टाफ ने भी कामकाज का बहिष्कार कर दिया। इस अचानक हुई हड़ताल से आईसीयू में भर्ती 12 बेहद गंभीर मरीजों की जान सांसत में आ गई। हालांकि, समय रहते अस्पताल के वरिष्ठ डॉक्टरों और अन्य प्रतिबद्ध नर्सिंग कर्मियों ने मोर्चा संभाल लिया और मरीजों की देखभाल सुनिश्चित की, जिससे एक बड़ा हादसा टल गया।
वायरल वीडियो और पुलिसिया कार्रवाई पर उठते सवाल
धरना स्थल से कर्मचारियों को हटाने की पुलिस कार्रवाई के दौरान जमकर हंगामा हुआ। कर्मचारियों, विशेषकर महिला कर्मियों का आरोप है कि पुलिस ने बल प्रयोग किया, उन्हें जबरन धक्का दिया और उनके साथ मारपीट की गई, जिसमें कई लोगों को चोटें आई हैं। दूसरी ओर, पुलिस विभाग ने इन सभी आरोपों को पूरी तरह से निराधार बताया है। पुलिस का स्पष्टीकरण है कि अस्पताल के मुख्य परिसर में धरने के कारण चिकित्सा सेवाएं बाधित हो रही थीं। पुलिस ने केवल प्रदर्शनकारियों से धरना स्थल को मुख्य भवन से हटाकर दूसरी जगह स्थानांतरित करने का अनुरोध किया था। इसी दौरान कुछ लोगों द्वारा विरोध किए जाने पर हालात तनावपूर्ण हो गए।
कानूनी कार्रवाई की तैयारी, गतिरोध अब भी बरकरार
फिलहाल, पुलिस अधिकारियों का कहना है कि अस्पताल में अब शांति व्यवस्था कायम है और स्थिति पूरी तरह से नियंत्रण में है। चिकित्सा सेवाएं धीरे-धीरे पटरी पर लौट रही हैं। सरकारी काम में बाधा डालने वालों के खिलाफ आवश्यक कानूनी कार्रवाई की जा रही है। भले ही पुलिस ने हालात पर काबू पा लिया हो, लेकिन अस्पताल प्रशासन और आउटसोर्स कर्मचारियों के बीच मांगों को लेकर जो गतिरोध पैदा हुआ है, वह अभी भी ज्यों का त्यों बना हुआ है।





















































