सनातन धर्म के प्रमुख स्तंभ और ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को एक बेहद संगीन और झूठे मामले में फंसाने की एक गहरी साजिश का पर्दाफाश हुआ है। इस हाई-प्रोफाइल मामले में अब प्रयागराज स्थित इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। अदालत ने उस रिट याचिका पर उत्तर प्रदेश सरकार से विस्तृत जवाब तलब किया है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि एक रसूखदार व्यक्ति के दबाव में शंकराचार्य के खिलाफ फर्जी केस दर्ज करने से मना करने पर याचिकाकर्ता को लगातार जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं। इस सनसनीखेज खुलासे के बाद उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में हड़कंप मच गया है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त: यूपी पुलिस के आला अधिकारियों को नोटिस जारी
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए न्यायमूर्ति जे. जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की प्रतिष्ठित खंडपीठ ने इस रिट याचिका पर त्वरित सुनवाई की। अदालत ने आशुतोष ब्रह्मचारी को भी इस रिट याचिका में एक प्रतिवादी के रूप में पक्षकार बनाने का कड़ा निर्देश जारी किया है। इसके साथ ही, माननीय उच्च न्यायालय ने अपने रजिस्ट्रार (अनुपालन) को स्पष्ट आदेश दिया है कि वह इस मामले से जुड़े अदालती निर्देशों को बरेली जोन के पुलिस महानिरीक्षक (IG), शाहजहांपुर के पुलिस अधीक्षक (SP) और शाहजहांपुर के सदर बाजार थाने के प्रभारी (SO) को तत्काल प्रेषित करें। अदालत ने यह भी सुनिश्चित किया है कि यह आदेश बरेली और शाहजहांपुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) के माध्यम से संबंधित अधिकारियों तक पहुंचे। खंडपीठ ने ९ जुलाई २०२६ को दिए अपने आदेश में इस मामले की अगली सुनवाई के लिए १६ जुलाई २०२६ की तारीख मुकर्रर की है। गौरतलब है कि मामले का मुख्य किरदार आशुतोष ब्रह्मचारी मथुरा के बहुचर्चित शाही ईदगाह-कृष्ण जन्मभूमि विवाद से जुड़े मुकदमों में भी एक मुख्य वादी के रूप में शामिल है।
तीन अज्ञात लोग, लाखों का लालच और पॉक्सो एक्ट की साजिश
अदालत में दाखिल की गई इस रिट याचिका में रामाशंकर दीक्षित नामक व्यक्ति ने चौंकाने वाले दावे किए हैं। याचिका के मुताबिक, १८ फरवरी २०२६ को तीन अज्ञात संदिग्ध व्यक्ति उनके पास पहुंचे थे। उन अज्ञात लोगों ने दीक्षित के सामने एक बेहद शर्मनाक प्रस्ताव रखा और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को एक झूठे और गंभीर मामले में फंसाने के बदले लाखों रुपये की मोटी रकम देने की पेशकश की। जब याचिकाकर्ता रामाशंकर दीक्षित ने अपने जमीर का सौदा करने और इस झूठी साजिश का हिस्सा बनने से साफ इनकार कर दिया, तो उन अज्ञात बदमाशों ने उन्हें अंजाम भुगतने और जान से मारने की सीधे तौर पर धमकी दी। यह पूरी साजिश उस वक्त और उजागर हो गई जब खुद आशुतोष ब्रह्मचारी ने जून महीने में यह कबूल किया कि उसने मथुरा स्थित देवा आश्रम के अत्यंत प्रभावशाली महंत रामचंद्र दास के भारी दबाव में आकर शंकराचार्य के खिलाफ एक मनगढ़ंत और झूठी शिकायत दर्ज कराई थी। इसी शिकायत के आधार पर प्रयागराज की एक विशेष पॉक्सो (POCSO) अदालत ने ५६ वर्षीय स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके सहयोगियों के खिलाफ यौन उत्पीड़न का मुकदमा दर्ज करने का आदेश पुलिस को दिया था।
रक्षक ही बने भक्षक? सुरक्षाकर्मियों पर लगा बयान बदलने का दबाव बनाने का आरोप
याचिकाकर्ता रामाशंकर दीक्षित ने स्थानीय पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी बेहद गंभीर और विचलित करने वाले सवाल खड़े किए हैं। दीक्षित के अनुसार, जब उन्हें अज्ञात तत्वों से जान का खतरा महसूस हुआ, तो उन्होंने फौरन स्थानीय पुलिस प्रशासन से गुहार लगाई। उनकी शिकायत के बाद सुरक्षा के मद्देनजर उनके आवास पर कुछ पुलिसकर्मियों की तैनाती तो कर दी गई, लेकिन कहानी में मोड़ तब आया जब सुरक्षा में लगाए गए इन पुलिसकर्मियों ने ही कथित तौर पर उन पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। आरोप है कि सरकारी बंदूकधारी सुरक्षाकर्मी याचिकाकर्ता पर लगातार इस बात का दबाव बना रहे थे कि वह मजिस्ट्रेट और जांच एजेंसी के सामने अपना बयान बदल लें। इस प्रशासनिक उत्पीड़न से तंग आकर दीक्षित ने उच्च पुलिस अधिकारियों से दोबारा लिखित शिकायत की, लेकिन जब सत्ता और प्रशासन के गलियारों से कोई ठोस या प्रभावी कदम नहीं उठाया गया, तो हताश होकर याचिकाकर्ता ने अपनी जान की हिफाजत के लिए देश की न्यायिक व्यवस्था की सर्वोच्च चौखट यानी इलाहाबाद उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।





















































