प्रयागराज: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने देश में बाल विवाह और बच्चों के अधिकारों के संरक्षण को लेकर एक बेहद युगांतरकारी और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में व्यवस्था दी है कि विवाह की न्यूनतम आयु के संदर्भ में किशोरावस्था की शुरुआत (प्यूबर्टी) को मान्यता देने वाला मुस्लिम पर्सनल लॉ, देश के विशेष दंडात्मक कानूनों जैसे ‘बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम’ (PCMA) और ‘यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम’ (पॉक्सो) की वैधानिक शक्ति को कतई कम या निष्प्रभावी नहीं कर सकता। उच्च न्यायालय ने जोर देकर कहा कि ये विशेष कानून बच्चों के खिलाफ होने वाले किसी भी प्रकार के यौन शोषण और कम उम्र में विवाह को पूरी तरह से संज्ञेय अपराध की श्रेणी में रखते हैं।
कानून के समक्ष सब बराबर: धर्म चाहे कोई भी हो, शादी के लिए तय उम्र का नियम होगा लागू
माननीय न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और माननीय न्यायमूर्ति अचल सचदेव की संयुक्त खंडपीठ ने इस कानूनी मुद्दे की व्याख्या करते हुए कहा कि भारत में निवास करने वाले प्रत्येक नागरिक पर, चाहे उसका धार्मिक झुकाव या पर्सनल लॉ कुछ भी हो, विवाह की वही न्यूनतम आयु सीमा अनिवार्य रूप से लागू होगी जो बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (PCMA) द्वारा वैधानिक रूप से तय की गई है।
खंडपीठ ने यह कड़ा रुख बुलंदशहर जिले की निवासी रुबी और 18 अन्य सह-याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर की गई उस याचिका को सिरे से खारिज करते हुए अपनाया, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज पुलिस प्राथमिकी (FIR) को निरस्त करने की गुहार लगाई थी। इन सभी याचिकाकर्ताओं पर आरोप है कि उन्होंने एक 16 वर्षीय नाबालिग मुस्लिम लड़की का बाल विवाह रुकवाने गई पुलिस और चाइल्डलाइन की संयुक्त रेस्क्यू टीम पर न केवल जानलेवा हमला किया, बल्कि उनके सरकारी दायित्वों के निर्वहन में गंभीर बाधा भी उत्पन्न की।
क्या थी मुस्लिम पक्ष की दलील और अदालत ने क्यों किया उसे खारिज?
अदालत के समक्ष सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के विद्वान अधिवक्ता ने यह तर्क प्रस्तुत किया था कि शरिया और मुस्लिम पर्सनल लॉ के सिद्धांतों के अनुसार, यदि कोई लड़की किशोरावस्था की दहलीज पर कदम रख देती है (जिसे सामान्यतः 15 वर्ष की आयु माना जाता है), तो वह अपनी मर्जी से निकाह करने या परिजनों द्वारा उसका निकाह कराए जाने के लिए पूरी तरह से योग्य हो जाती है। याचिका में यह भी दावा किया गया था कि बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 (PCMA) के दंडात्मक प्रावधान उनके धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों (पर्सनल लॉ) के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकते।
उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने इस दलील को पूरी तरह से अतार्किक पाते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने साफ किया कि सामाजिक सुधार और बच्चों के कल्याण के लिए संसद द्वारा पारित किया गया कोई भी धर्मनिरपेक्ष कानून किसी भी पर्सनल लॉ से ऊपर है और वह बाल विवाह पर लगे वैधानिक प्रतिबंधों या पॉक्सो एक्ट के कड़े कानूनी प्रभावों को किसी भी सूरत में शिथिल नहीं कर सकता।
पॉक्सो अधिनियम के उल्लंघन को वैधता देने जैसा होगा बाल विवाह
उच्च न्यायालय ने बाल विवाह और यौन अपराधों के अंतर्संबंधों पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि देश में 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी किशोर या किशोरी के विवाह को किसी व्यक्तिगत कानून की आड़ में मान्यता दी जाती है, तो यह स्थिति सीधे तौर पर पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act) के मूल उद्देश्यों की हत्या करने जैसी होगी। चूंकि विवाह और शारीरिक संबंध आपस में जुड़े हुए हैं, इसलिए नाबालिग की शादी को स्वीकार करना सीधे तौर पर बाल यौन शोषण को कानूनी जामा पहनाने जैसा खतरनाक कृत्य होगा, जिसकी इजाजत भारतीय संविधान और देश की न्यायपालिका कभी नहीं दे सकती।
इसके साथ ही, अदालत ने रेस्क्यू टीम के साथ की गई बर्बरता का संज्ञान लेते हुए कहा कि सरकारी कर्मचारियों को डराने, धमकाने और उन पर हमला करने के पुख्ता विवरण प्राथमिकी में मौजूद हैं। स्थिति इतनी भयावह थी कि टीम के सदस्यों को अपनी जान बचाकर भागना पड़ा था और आरोपी उस नाबालिग लड़की को प्रशासनिक संरक्षण से जबरन छीन ले गए थे, जिसे बाद में कड़ी मशक्कत के बाद दोबारा रेस्क्यू किया गया। कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह सरकारी लोकसेवकों को ड्यूटी करने से रोकने और कानून हाथ में लेने का एक गंभीर आपराधिक मामला है, जिसकी निष्पक्ष और गहन जांच अत्यंत आवश्यक है। इस टिप्पणी के साथ न्यायालय ने 1 जुलाई को ही इस याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया।





















































