नागरिक अधिकारों की रक्षा करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पुलिस की मनमानी कार्यप्रणाली पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सख्त टिप्पणी की है। न्यायमूर्ति जे. जे. मुनीर और न्यायमूर्ति संजय कुमार की खंडपीठ ने एक मामले में सुनवाई करते हुए व्यक्ति को 24 घंटे तक अवैध रूप से पुलिस हिरासत में रखने को संविधान प्रदत्त स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन माना है। न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया है कि वह पीड़ित मातांबर मिश्रा को मुआवजे के तौर पर 25,000 रुपये का भुगतान करे। सबसे बड़ी बात यह है कि अदालत ने स्पष्ट किया है कि सरकार यह धनराशि उस दोषी पुलिस अधिकारी के वेतन से वसूलने के लिए स्वतंत्र है, जिसकी लापरवाही या मनमानी के कारण यह अवैध हिरासत हुई।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला 26 नवंबर से 27 नवंबर, 2022 के बीच का है, जब मातांबर मिश्रा को पुलिस द्वारा अवैध रूप से हिरासत में रखा गया था। इस प्रताड़ना के खिलाफ पीड़ित ने उच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल की थी। अदालत के समक्ष पेश किए गए तथ्यों और पुलिस द्वारा दाखिल जवाबी हलफनामे से यह स्पष्ट हुआ कि पुलिस विभाग ने अवैध हिरासत के आरोपों को सिरे से खारिज नहीं किया। इस पर टिप्पणी करते हुए खंडपीठ ने कहा कि स्पष्ट रूप से याचिकाकर्ता को उसके व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित रखा गया, जो कानून के शासन के विपरीत है।
‘अधिकारी पुराने ढर्रे पर कर रहे काम’ – कोर्ट की सख्त टिप्पणी
अदालत ने पुलिस की कार्यशैली पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि पुलिस अधिकारी अक्सर यह मानकर चलते हैं कि यदि वे किसी नागरिक के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं, तो शायद ही कोई व्यक्ति कानूनी लड़ाई लड़ने की हिम्मत करेगा। न्यायाधीशों ने इस मानसिकता को उजागर करते हुए कहा कि अधिकारी इस ‘आंकड़ा आधारित’ धारणा पर काम करते हैं कि ‘हजारों उल्लंघनों में से शायद ही कोई एक मामला सामने आएगा जिसमें पीड़ित अपने अधिकारों के लिए न्यायालय की शरण लेगा।’ अदालत ने इस सोच को लोकतंत्र के लिए खतरनाक बताया और कहा कि जब तक पुलिस बल जवाबदेही के सिद्धांत को नहीं समझेगा, तब तक अधिकारों का हनन जारी रहेगा।
दोषी अधिकारी के वेतन से होगी रिकवरी
न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि न्याय की अवधारणा तभी पूरी हो सकती है जब पीड़ित को राहत मिले। राज्य सरकार को निर्देश दिया गया है कि वह मुआवजा राशि का भुगतान तुरंत करे। साथ ही, तत्कालीन बरौत चौकी प्रभारी सूर्य प्रकाश दुबे, जिन्हें इस अवैध हिरासत के लिए जिम्मेदार माना गया है, के वेतन से यह राशि वसूलने का विकल्प भी सरकार को दिया गया है।
अदालत ने इस फैसले की प्रतियां अपर मुख्य सचिव (गृह), पुलिस आयुक्त प्रयागराज, सहायक पुलिस आयुक्त हंडिया और संबंधित चौकी प्रभारी को अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। यह फैसला भविष्य में पुलिस अधिकारियों के लिए एक कड़ा संदेश है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है और नागरिकों की स्वतंत्रता का हनन करने पर उन्हें व्यक्तिगत रूप से भी जवाबदेह ठहराया जा सकता है।





















































