लखनऊ/रामपुर
सलाखों के पीछे दिन काट रहे समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री मोहम्मद आजम खान के इर्द-गिर्द जांच एजेंसियों की घेराबंदी और सख्त हो गई है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की गंभीर शिकायत और साक्ष्यों के आधार पर उत्तर प्रदेश पुलिस ने आजम खान, उनके मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट तथा दो निजी फर्मों के खिलाफ एक ताजा आपराधिक मुकदमा दर्ज किया है। इस पूरे प्रकरण में यूनिवर्सिटी निर्माण के बहाने सरकारी खजाने के अंधाधुंध दुरुपयोग और भारी वित्तीय गड़बड़ियों का पर्दाफाश हुआ है।
ईडी की सिफारिश पर पुलिस की ताबड़तोड़ कानूनी कार्रवाई
प्रवर्तन निदेशालय के लखनऊ क्षेत्रीय कार्यालय ने धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) की धारा 66(2) का उपयोग करते हुए 10 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को विस्तृत साक्ष्य और जांच रिपोर्ट ईमेल के माध्यम से भेजी थी। केंद्रीय जांच एजेंसी के इसी पत्राचार को आधार बनाते हुए रामपुर पुलिस ने मंगलवार को औपचारिक प्राथमिकी दर्ज कर ली। इस नए मुकदमे में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की गंभीर धाराएं—61 (आपराधिक षड्यंत्र), 316(5) (आपराधिक विश्वासघात) और 318(4) (धोखाधड़ी) के साथ-साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के कड़े प्रावधान शामिल किए गए हैं।
25 से अधिक मुकदमों को मिलाकर पीएमएलए के तहत बड़ी तैयारी
आजम खान और उनके नजदीकियों के खिलाफ पूर्व से ही विभिन्न थानों में 25 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज हैं। जांच से जुड़े आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय एजेंसी अब इन तमाम मुकदमों और नई एफआईआर को समाहित कर वर्ष 2019 में दर्ज अपनी प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट (ईसीआईआर) का दायरा बढ़ाने जा रही है। इसका मुख्य उद्देश्य धनशोधन कानून के तहत एक विस्तृत और अचूक कानूनी जाल तैयार करना है। इसी सिलसिले में एजेंसी ने बीते अगस्त महीने में बड़े स्तर पर छापे मारे थे और मंगलवार को रामपुर कारागार में पहुंचकर आजम खान से गहन पूछताछ भी की थी।
सरकारी रसूख और सार्वजनिक धन के निजी इस्तेमाल का आरोप
जांच एजेंसी के दस्तावेजों के अनुसार, मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट के मुख्य कर्ताधर्ता आजम खान हैं, जबकि उनके परिजन और नजदीकी सहयोगी ट्रस्टी के तौर पर काम करते हैं। लखनऊ में मुख्यालय रखने वाला यह ट्रस्ट रामपुर में वर्ष 2006 में स्थापित मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय और एक निजी स्कूल का संचालन करता है। ईडी का आरोप है कि पद और राजनीतिक प्रभाव का अनुचित लाभ उठाकर सरकारी ठेकों को प्रभावित किया गया। इसके अलावा, सार्वजनिक निर्माण कार्यों के लिए स्वीकृत सरकारी बजट को यूनिवर्सिटी के निजी निर्माण कार्यों में खपाया गया और धन की हेराफेरी करके उसे पुनः ट्रस्ट के खातों तक पहुंचाया गया।
416 करोड़ रुपये से अधिक की लागत का कोई हिसाब नहीं
इस पूरे मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू विश्वविद्यालय परिसर के भौतिक मूल्यांकन और ट्रस्ट द्वारा दाखिल बही-खातों के बीच का भारी अंतर है। आयकर विभाग द्वारा नवंबर 2023 में तैयार की गई आधिकारिक मूल्यांकन रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया कि परिसर में तैयार इमारतों के निर्माण पर वास्तविक रूप से 494.46 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। इसके उलट, वित्त वर्ष 2013-14 से 2024-25 के दौरान ट्रस्ट के आयकर रिटर्न (आईटीआर) में कुल पूंजीगत व्यय महज 78.32 करोड़ रुपये दर्ज किया गया है। लगभग 416.14 करोड़ रुपये की इस भारी-भरकम राशि का ट्रस्ट के अधिकृत आय-व्यय से कोई मेल नहीं बैठता, जिसे जांच एजेंसियां काले धन और सार्वजनिक कोष की बंदरबांट मान रही हैं।

















































