इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने ही तीन मासूम बच्चों को नदी में डुबोकर जान से मारने के सनसनीखेज मामले में मृत्युदंड की सजा पा चुकी एक महिला और उसके देवर को बरी कर दिया है। अदालत ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ अपराध को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा है। न्यायालय ने घटना के कथित प्रत्यक्षदर्शी आठ वर्षीय बालक की गवाही को विरोधाभासी और सिखाया-पढ़ाया हुआ मानते हुए निचली अदालत द्वारा दी गई फांसी व उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया।
हाईकोर्ट का सख्त रुख: ‘सिखाया गया था चश्मदीद बच्चे का बयान’
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की संयुक्त खंडपीठ ने प्रियंका तथा उसके देवर आशीष उर्फ डैनी की आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए यह अहम निर्णय सुनाया। ट्रायल कोर्ट ने प्रियंका को दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड (फांसी) और आशीष को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
उच्च न्यायालय की पीठ ने फैसले में रेखांकित किया कि अभियोजन ने अपने केस को साबित करने के लिए जीवित बचे 8 वर्षीय बच्चे की गवाही को मुख्य आधार बनाया था। हालांकि, उस बालक के बयानों में ऐसे गंभीर अंतर्विरोध मौजूद हैं जिन्हें किसी भी सूरत में सुसंगत नहीं माना जा सकता। अदालत ने पाया कि बालक के शब्द स्वाभाविक नहीं बल्कि स्पष्ट तौर पर किसी के सिखाए-पढ़ाए (ट्यूटर किए गए) प्रतीत होते हैं, जिसके चलते उसके बयान पर विश्वास करके किसी को फांसी के फंदे पर नहीं भेजा जा सकता।
औरैया की सेंगुर नदी से बरामद हुए थे 3 मासूमों के शव
यह दर्दनाक मामला उत्तर प्रदेश के औरैया जनपद से जुड़ा हुआ है। 27 जून 2024 को सेंगुर नदी के गहरे पानी से तीन सगे भाइयों—माधव उर्फ गुंगा (6 वर्ष), आदित्य उर्फ टिल्ला (5 वर्ष) और मंगल (4 वर्ष) के शव बरामद किए गए थे।
पुलिस में दर्ज कराई गई प्राथमिकी के मुताबिक, प्रियंका पर आरोप लगाया गया था कि वह अपने कथित साथी व देवर आशीष उर्फ डैनी के साथ मिलकर अपने चार बेटों को तड़के करीब 5 बजे सेंगुर नदी के पुल पर लेकर गई थी। पुलिस का दावा था कि दोनों अपने कथित संबंधों के रास्ते से बच्चों को हटाने के इरादे से उन्हें नदी में डुबोने पहुंचे थे। अभियोजन के अनुसार, सबसे बड़ा बेटा सोनू किसी तरह जान बचाकर बाहर निकल आया, जबकि तीन मासूम पानी में डूब गए।
बयानों में भारी विरोधाभास: चाचा और बच्चे की कहानी में नहीं मिला तालमेल
अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि प्राथमिकी दर्ज कराने की प्रक्रिया और गवाहों के बयानों में भारी विसंगतियां थीं। जीवित बचे बच्चे सोनू ने अदालत को बताया था कि एक ग्राम प्रधान उसे अपने घर ले गए थे, जहां उसने पूरी घटना सुनाई और फिर प्रधान ने पुलिस को इत्तिला दी। बच्चे का यह भी दावा था कि उसने अपने चाचा मनीष को पूरी बात बताई, जिसके आधार पर मनीष ने पुलिस थाने में नामजद केस दर्ज कराया।
इसके विपरीत, केस दर्ज कराने वाले चाचा मनीष ने अदालत में बिल्कुल अलग बयान दे दिया। मनीष ने गवाही दी कि उसे घटना की जानकारी बच्चे से नहीं मिली थी, बल्कि ग्राम प्रधान के माध्यम से पुलिस को सूचना मिली और वहीं से उसे खबर लगी। मनीष यह भी स्पष्ट नहीं कर सका कि सबसे पहले घटना की सूचना देने वाला व्यक्ति वास्तव में कौन था।
ट्रायल कोर्ट का फैसला निरस्त, दोनों को तत्काल रिहा करने का आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पाया कि जब अभियोजन की पूरी कहानी ही परस्पर विरोधी बयानों और कमजोर साक्ष्यों पर टिकी है, तो किसी भी आरोपी को हत्या जैसे जघन्य अपराध में दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने दोनों आरोपियों की अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालत द्वारा भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 के तहत प्रियंका को सुनाई गई फांसी और आशीष को दी गई आजीवन कारावास की सजा को निरस्त कर दिया। पीठ ने निर्देश दिया कि यदि दोनों किसी अन्य आपराधिक मामले में वांछित नहीं हैं, तो उन्हें फौरन जेल से रिहा किया जाए।





















































