उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग ने एक बार फिर राष्ट्रीय फलक पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। कौशाम्बी जनपद में तैनात समर्पित शिक्षिका शालिनी कुशवाहा को केंद्र सरकार के प्रतिष्ठित राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए चुना गया है। देश की राजधानी नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में आयोजित होने वाले भव्य समारोह में भारत के राष्ट्रपति द्वारा उन्हें यह सर्वोच्च नागरिक शैक्षणिक सम्मान प्रदान किया जाएगा। प्राथमिक शिक्षा के उन्नयन में अभूतपूर्व योगदान देने वाली शालिनी की इस ऐतिहासिक सफलता से न केवल उनके स्वजन बल्कि पूरा जनपद और समूचा प्रांतीय शिक्षा विभाग गर्व से सराबोर है।
रेवाड़ी से शुरू हुआ सफर और प्राथमिक शिक्षा में क्रांति
एक सामान्य अध्यापिका से लेकर राष्ट्रपति भवन के प्रतिष्ठित मंच तक का यह मुकाम वर्षों की अटूट निष्ठा, कड़े परिश्रम और पारिवारिक सम्बल का जीवंत उदाहरण है। शालिनी कुशवाहा की शैक्षणिक यात्रा का शुरुआती चरण रेवाड़ी में गुजरा, जहाँ उन्होंने शिक्षण कार्य प्रारंभ किया और अपनी योग्यता के बूते आगे चलकर प्रधानाध्यापक पद का दायित्व संभाला। इसके उपरांत उनका स्थानांतरण कौशाम्बी क्षेत्र में हुआ। साल 2015 में बेसिक शिक्षा परिषद के तहत सरकारी शिक्षक के रूप में उनका अंतिम चयन हुआ। विद्यालयीय परिवेश को आधुनिक रूप देने तथा अध्ययन-अध्यापन की गुणवत्ता को नई ऊंचाई देने के लिए उन्हें पूर्व में राज्य स्तरीय शिक्षक पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है।
एआरपी पद पर रहकर पूरे जनपद के शिक्षकों को किया प्रेरित
शालिनी ने शिक्षण विधा को कभी सीमित दायरों में नहीं बांधा। उन्होंने बेसिक शिक्षा तंत्र में एकेडमिक रिसोर्स पर्सन (एआरपी) के रूप में भी अपनी महती भूमिका निभाई। इस पद पर रहते हुए उन्होंने दूरदराज के परिषदीय विद्यालयों के शैक्षणिक स्तर की सतत समीक्षा की, प्रभावी निरीक्षण किए और साथी अध्यापकों को नवाचारी पद्धतियों से पढ़ाने के लिए प्रशिक्षित किया। शिक्षकों का मनोबल बढ़ाना और उन्हें बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए नई शिक्षण तकनीकों से जोड़ना उनके दैनिक जीवन का मुख्य संकल्प बन गया।
परिवार और कर्तव्य के संतुलन की मिसाल बनीं शिक्षिका
शालिनी के जीवनसाथी प्रेम कुमार सिंह बताते हैं कि उनकी पत्नी ने गृहस्थी के गंभीर दायित्वों के बीच अपने पेशे के प्रति कभी ढिलाई नहीं बरती। नियमित पाठशाला जाना, घर लौटकर बच्चों का लालन-पालन करना और लगातार अपने शैक्षणिक कौशल को निखारते रहना उनकी दृढ़ दिनचर्या रही। प्रेम कुमार पूर्व में इलेक्ट्रोलक्स संस्थान में कार्यरत थे, किंतु वर्तमान में वह घरेलू मोर्चे को संभालकर पत्नी के कार्यों में संबल प्रदान कर रहे हैं। राष्ट्रीय पुरस्कार की घोषणा होते ही समूचे परिवार में उत्सव जैसा माहौल व्याप्त हो गया है।
भोर में चार बजे उठकर शुरू होती थी दिनचर्या
शालिनी की सुपुत्री जानवी अपनी मां की तपस्या को बेहद प्रेरणादायक मानती हैं। जानवी के अनुसार, उन्होंने कभी भी अपनी मां को बिना किसी रचनात्मक कार्य के नहीं देखा। भोर के ठीक चार बजे उठकर दिन की शुरुआत करना, घर का कामकाज निबटाना और फिर बेटियों को स्कूटर पर बैठाकर विद्यालय ले जाना उनकी दिनचर्या में शामिल था। उसी विद्यालय में शालिनी की दोनों बेटियां पढ़ती थीं, जहां वे अध्यापन करती थीं। अभिभावकों के साथ आत्मीय संवाद और सहयोगात्मक आचरण की बदौलत वह उप-प्रधानाचार्य के दायित्व तक पहुंचीं।
सरकारी स्कूल को निजी कॉन्वेंट जैसा बनाने का संकल्प
वर्ष 2010 में जब यह परिवार कौशाम्बी में आ बसा, तब शालिनी ने सरकारी प्राथमिक विद्यालय को एक उत्कृष्ट संस्थान के रूप में गढ़ने की ठान ली थी। उनका स्पष्ट ध्येय था कि ग्रामीण व वंचित पृष्ठभूमि से आने वाले बच्चों को भी उच्चस्तरीय कॉन्वेंट जैसी अध्ययन सुविधाएं और अनुकूल वातावरण उपलब्ध हो। सामाजिक या आर्थिक लाचारी किसी भी मेधावी बालक की प्रगति में रोड़ा न बने, इसी दृष्टिकोण के साथ उन्होंने लगातार कार्य किया। मां के त्याग और जनसेवा से प्रेरित होकर जानवी अब सिविल सेवाओं में जाकर प्रशासनिक व्यवस्था के माध्यम से वंचितों की सेवा करने की तैयारी में जुटी हैं।





















































