अयोध्या। उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी अयोध्या में भव्य राम मंदिर के चढ़ावे में हुए कथित गबन और वित्तीय हेरफेर के मामले में एक बड़ा कानूनी घटनाक्रम सामने आया है। फैजाबाद की विशेष भ्रष्टाचार निवारण अदालत ने इस हाई-प्रोफाइल मामले के सभी 8 मुख्य आरोपियों की न्यायिक हिरासत की अवधि को आगामी 14 दिनों के लिए और आगे बढ़ा दिया है। इन आरोपियों की पूर्व में तय की गई न्यायिक रिमांड की समय सीमा सोमवार को समाप्त हो रही थी। अभियोजन पक्ष से प्राप्त आधिकारिक जानकारी के अनुसार, सुरक्षा कारणों और विधिक प्रक्रियाओं को ध्यान में रखते हुए सभी आरोपियों को अपर जिला न्यायाधीश प्रतिभा नारायण की विशेष अदालत के समक्ष वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश किया गया, जहां से माननीय न्यायाधीश ने उन्हें 27 जुलाई तक के लिए दोबारा न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेजने का आदेश जारी कर दिया।
दो मुख्य आरोपियों की पुलिस कस्टडी रिमांड पर आज आएगा फैसला
इस संवेदनशील मामले की जांच को आगे बढ़ाने के लिए अभियोजन पक्ष ने शुक्रवार को अदालत से दो प्रमुख आरोपियों—रामाशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव और बैंक के पूर्व कर्मचारी सुभाष श्रीवास्तव की पुलिस कस्टडी रिमांड (पीसीआर) की जोरदार मांग की थी। सरकारी वकीलों की इस रिमांड अर्जी पर गहन दलीलें सुनने के बाद अदालत ने अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया था, जिस पर आज मंगलवार (14 जुलाई) को कोर्ट अपना अंतिम फैसला सुनाएगी।
पुलिस का मानना है कि इन दोनों की कस्टडी मिलने के बाद घोटाले की कई और परतें खुलेंगी। जांच एजेंसी का दावा है कि पूर्व में हुई पूछताछ के दौरान इन दोनों आरोपियों के बयानों में कई विरोधाभास और नई जानकारियां सामने आई हैं। इन जानकारियों की जमीनी तस्दीक करने और मंदिर के पवित्र चढ़ावे से गबन की गई राशि व अन्य तकनीकी सबूतों की शत-प्रतिशत बरामदगी के लिए इन्हें पुलिस हिरासत में लेकर पूछताछ करना बेहद लाजिमी हो गया है।
चाबियों का राज और बैंक कर्मी की मिलीभगत से खुला खेल
विशेष जांच दल (SIT) की अब तक की जांच रिपोर्ट के अनुसार, इस पूरे सुनियोजित घोटाले के तार बेहद ऊंचे रसूखदारों से जुड़े हैं। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपत राय के पूर्व निजी चालक रामाशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव की इस पूरे प्रकरण में बेहद संदिग्ध भूमिका रही है। आरोप है कि टिन्नू यादव के पास ही मंदिर की महत्वपूर्ण दान पेटियों (डोनेशन बॉक्सेस) की चाबियां अनधिकृत रूप से मौजूद रहती थीं।
वहीं, इस गिरोह के दूसरे मुख्य मोहरे सुभाष श्रीवास्तव, जो एक प्रतिष्ठित बैंक के पूर्व कर्मचारी हैं, उनकी जिम्मेदारी दान की गई राशि और चढ़ावे की गिनती की पूरी प्रक्रिया की निगरानी करने की थी। इन दोनों ने मिलकर बैंकिंग और सुरक्षा व्यवस्था की कमियों का फायदा उठाकर पवित्र चढ़ावे की बड़ी रकम को खुर्द-बुर्द किया। इससे पहले पुलिस इस गिरोह के चार अन्य सह-आरोपी अविनाश शुक्ला, अनुकल्प मिश्रा, लवकुश मिश्रा और करुणेश पांडेय को अलग-अलग तारीखों पर पुलिस रिमांड में लेकर कड़ी पूछताछ कर चुकी है, जिससे चढ़ावा चोरी से जुड़े कई डिजिटल और दस्तावेजी साक्ष्य पुलिस के हाथ लगे हैं।
स्थानीय वकीलों का केस लड़ने से साफ इनकार, सरकार ने दी कानूनी मदद
इस मामले में एक अभूतपूर्व सामाजिक और नैतिक मोड़ तब आया, जब फैजाबाद बार एसोसिएशन ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास कर राम मंदिर के पवित्र चढ़ावे की चोरी करने वाले किसी भी आरोपी की तरफ से वकालतनामा न दाखिल करने और उनका केस न लड़ने का एकतरफा ऐतिहासिक फैसला किया। स्थानीय वकीलों के इस कड़े रुख के कारण जब आरोपियों को कोई विधिक प्रतिनिधित्व नहीं मिला, तो संवैधानिक प्रावधानों के तहत उत्तर प्रदेश सरकार ने आगे बढ़कर आरोपियों को सरकारी खर्चे पर कानूनी सहायता (लीगल एड) मुहैया कराई है।
विशेष लोक अभियोजक उमेश दुबे ने पुराने घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए बताया कि शुरुआत में 29 जून को जब विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण) रजत वर्मा की अदालत में इन सभी 8 आरोपियों (अविनाश शुक्ला, अनुकल्प मिश्रा, लवकुश मिश्रा, मनीष कुमार यादव, करुणेश पांडेय, रामाशंकर मिश्रा, सुभाष श्रीवास्तव और रामाशंकर यादव) को पेश किया गया था, तब पुलिस ने उनकी रिमांड नहीं मांगी थी, जिससे वे न्यायिक हिरासत में चले गए थे।
वकीलों के लिए कड़ा फरमान: पैरवी करने पर ₹5 लाख का अर्थदंड
धार्मिक आस्था से जुड़े इस संवेदनशील मामले को लेकर फैजाबाद बार एसोसिएशन का आक्रोश साफ देखा जा सकता है। बार एसोसिएशन ने अपनी कार्यकारिणी की बैठक में एक बेहद सख्त और दंडात्मक नियम पारित किया है। इस नियम के मुताबिक, यदि एसोसिएशन का कोई भी पंजीकृत वकील या सदस्य राम मंदिर चढ़ावा घोटाले के इन आरोपियों की तरफ से अदालत में पैरवी करने या उनका केस हाथ में लेने की हिमाकत करता है, तो उस पर ₹5,00,000 (पांच लाख रुपये) का भारी-भरकम जुर्माना लगाया जाएगा। इसके साथ ही तत्काल प्रभाव से बार एसोसिएशन से उसकी प्राथमिक सदस्यता को हमेशा के लिए निरस्त कर दिया जाएगा।
इस बीच, राज्य सरकार द्वारा आरोपियों के बचाव पक्ष के लिए नियुक्त किए गए अभियोजन विभाग के एक पूर्व संयुक्त निदेशक व वरिष्ठ अधिवक्ता कुलशेखर सिंह ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि चूंकि वह फैजाबाद बार एसोसिएशन के सदस्य नहीं हैं, इसलिए उन पर यह प्रतिबंध लागू नहीं होता। एडवोकेट कुलशेखर सिंह अगले सप्ताह से आरोपियों की तरफ से अदालत में विधिक पैरवी शुरू कर सकते हैं।





















































