गौतमबुद्ध नगर में जमीन अधिग्रहण और पुनर्वास के पुराने वादों पर अमल न होने से भड़के अन्नदाताओं का आक्रोश चरम पर पहुंच चुका है। अपनी कई अहम मांगों को लेकर लामबंद हुए किसानों का महापड़ाव लगातार तीसरे दिन भी पूरे दमखम के साथ जारी रहा। नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना विकास प्राधिकरण के मुख्य प्रशासनिक भवनों के बाहर किसानों ने तंबू-कनात गाड़कर चौपाल जमा ली है। प्रदर्शनकारियों ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि जब तक प्राधिकरण के अफसर उनकी बुनियादी समस्याओं का ठोस और स्थायी समाधान नहीं निकालते, वे अपने तंबू उखाड़कर वापस लौटने वाले नहीं हैं।
10 प्रतिशत विकसित भूखंड पर फंसा पेंच
धरने पर बैठे किसानों का कहना है कि बुनियादी ढांचे और आधुनिक विकास के नाम पर उनकी उपजाऊ जमीनें तो छीन ली गईं, मगर पुनर्वास पैकेज के तहत मिलने वाले अधिकार दशकों से हवा में लटके हैं। किसानों की सबसे बड़ी मांग 10 प्रतिशत विकसित आवासीय भूखंडों के आवंटन की है। आंदोलनकारियों का आरोप है कि अधिग्रहण के वक्त तय शर्तों के मुताबिक भूखंड देने का वादा तो किया गया था, लेकिन प्रशासनिक शिथिलता के कारण पीड़ित परिवार आज भी अपने वाजिब हक के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।
आबादी और लीज बैक के मसलों पर त्वरित कार्रवाई की दरकार
धरनास्थल पर जुटे ग्रामीणों ने आबादी निस्तारण और जमीन की लीज बैक से जुड़ी फाइलों के प्राधिकरण स्तर पर धूल फांकने को लेकर गहरा असंतोष व्यक्त किया। किसानों ने कहा कि वर्षों पुराने ऐसे प्रकरणों केनोएडा में गरमाया जमीन का मुद्दा: तीनों प्राधिकरणों के दफ्तरों पर किसानों का तीसरे दिन भी महाडेरा, 10% प्लॉट और 64.7% अतिरिक्त मुआवजे की हुंकार
गौतमबुद्ध नगर में जमीन अधिग्रहण और पुनर्वास के पुराने वादों पर अमल न होने से नाराज अन्नदाताओं का गुस्सा अब आर-पार की लड़ाई का रूप ले चुका है। नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यीडा) के प्रशासनिक भवनों के सामने किसानों का विरोध प्रदर्शन लगातार तीसरे दिन भी पूरे तेवर के साथ जारी रहा। तीनों महत्वपूर्ण विकास प्राधिकरणों के मुख्य द्वारों के बाहर तंबू-कनातें गाड़कर धरने पर बैठे प्रदर्शनकारियों ने दो-टूक चेतावनी दी है कि जब तक उनकी बुनियादी समस्याओं का ठोस और आधिकारिक निस्तारण नहीं हो जाता, तब तक यह घेराव अनवरत चलेगा।
10 प्रतिशत विकसित भूखंड पर फंसा पेंच
धरना दे रहे किसानों की सबसे अहम मांग जमीन अधिग्रहण के बदले 10 फीसदी विकसित आवासीय भूखंड आवंटित करने की है। किसानों का तर्क है कि विभिन्न औद्योगिक, इंफ्रास्ट्रक्चर और आवासीय परियोजनाओं के विस्तार के लिए उनकी पुश्तैनी उपजाऊ जमीनें अधिग्रहित कर ली गईं। विडंबना यह है कि दशकों बीतने के बावजूद पुनर्वास और जमीन के बदले भूखंड देने के जो वादे किए गए थे, वे कागजों से बाहर नहीं निकल सके। किसानों का स्पष्ट कहना है कि जमीन का यह वाजिब हिस्सा उनका हक है और इसके बिना वे अपने मोर्चे से पीछे नहीं हटेंगे।
आबादी विस्तार और लीज बैक के लंबित प्रकरण
प्रदर्शनकारियों ने प्राधिकरणों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाते हुए आबादी निस्तारण और लीज बैक की फाइलों के वर्षों से धूल फांकने का मुद्दा उठाया। अन्नदाताओं का आरोप है कि गांवों की आबादी की जमीन और लीज बैक से जुड़े सैकड़ों मामले बिना किसी वैध कारण के लंबे अरसे से अटकाए गए हैं। इस प्रशासनिक लेटलतीफी के चलते ग्रामीण परिवारों को रोजमर्रा के जीवन और निर्माण कार्यों में मानसिक व कानूनी प्रताड़ना झेलनी पड़ रही है। किसानों ने पुरजोर मांग की है कि इन तमाम लंबित प्रकरणों के लिए विशेष समय-सीमा तय कर त्वरित और स्थाई समाधान सुनिश्चित किया जाए।
64.7 फीसदी अतिरिक्त मुआवजे और आर्थिक सुरक्षा की मांग
आंदोलनकारियों का एक प्रमुख एजेंडा 64.7 प्रतिशत की दर से अतिरिक्त मुआवजा दिए जाने का भी है। किसानों के अनुसार, जिस समय उनकी जमीनों का अधिग्रहण हुआ, तब के तय मुआवजे और आज के आर्थिक परिवेश में जमीन के वास्तविक मूल्यों के बीच जमीन-आसमान का फासला आ चुका है। ऐसे में वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए प्रभावित काश्तकारों को उनका उचित आर्थिक प्रतिफल मिलना बेहद जरूरी है, जिससे वे सम्मानजनक जीवन जी सकें।
12 वर्षों से फ्रीज सर्किल रेट और युवाओं का रोजगार
धरने के दौरान किसानों ने सर्किल रेट में पिछले करीब 12 सालों से कोई बढ़ोतरी न किए जाने पर भी गहरा रोष जताया। किसानों का कहना है कि एक दशक से अधिक समय में जमीन के बाजार भाव कई गुना बढ़ गए, लेकिन सरकारी सर्किल रेट जस के तस बने हुए हैं। इसलिए अब सर्किल रेट को वर्तमान बाजार दर के अनुकूल संशोधित कर ही मुआवजा तय किया जाए। इसके साथ ही, विस्थापित परिवारों के युवाओं के लिए रोजगार का सवाल भी प्रमुखता से गूंज रहा है। किसानों की मांग है कि जिन परिवारों की जमीनें विकास की भेंट चढ़ गईं, उनके बच्चों के सुरक्षित भविष्य के लिए स्थानीय उद्योगों और परियोजनाओं में रोजगार के अनिवार्य अवसर उपलब्ध कराए जाएं।
जब तक तीनों प्राधिकरणों के आला अधिकारी इन सभी अहम बिंदुओं पर कोई ठोस और लिखित फैसला नहीं लेते, तब तक यह किसान आंदोलन इसी तरह मजबूती से जारी रहेगा।





















































