बाराबंकी। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले अंतर्गत सूरतगंज विकास खंड क्षेत्र में उफान पर बह रही सरयू-घाघरा नदी ने विकराल रुख अख्तियार कर लिया है। मूसलाधार बारिश और बैराजों से लगातार छोड़े जा रहे लाखों क्यूसेक पानी के कारण तटवर्ती इलाकों में भीषण कटान जारी है, जिससे उपजाऊ खेत और रिहायशी बस्तियां देखते ही देखते जलधारा में विलीन होती जा रही हैं। पिछले कई दिनों से नदी के मुहाने पर खतरे से जूझ रही लगभग डेढ़ सदी पुरानी ऐतिहासिक मस्जिद तेज लहरों के थपेड़ों को बर्दाश्त नहीं कर सकी और जलसमाधि ले ली। मस्जिद के कटान के बाद अब पानी का बहाव सीधा करीब ग्यारह सौ वर्ष प्राचीन बाबा नारायण दास मंदिर की दहलीज तक आ पहुंचा है। इस अप्रत्याशित आपदा के बीच गंगा-जमुनी तहजीब की अद्भुत मिसाल भी देखने को मिल रही है, जहां मस्जिद के ढह जाने के गम के बावजूद मुस्लिम समुदाय के लोग मंदिर को सुरक्षित रखने के लिए दुआएं मांग रहे हैं।
बेघर होने को मजबूर ग्रामीण, आशियानों पर चला नदी का कहर
लगातार जमीन धंसने से तटीय पट्टी पर बसे दर्जनों परिवारों के सिर से छत छिन चुकी है। ग्रामीण आनन-फानन में अपने घरों से जरूरी गृहस्थी, अनाज और मवेशियों को निकालकर ऊंचे व सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन कर रहे हैं। स्थानीय निवासियों के अनुसार, नदी की उग्र धारा अब तक 40 से 50 पक्के-कच्चे मकानों को अपने आगोश में ले चुकी है। रिहायशी मकानों के अतिरिक्त एक शिव मंदिर और एक हनुमान मंदिर भी नदी के कटान की भेंट चढ़ गए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि दशकों से यह मान्यता रही है कि बाढ़ चाहे जितनी भी विकराल हो, सरयू की लहरें बाबा नारायण दास मंदिर को केवल स्पर्श करके लौट जाती थीं, किंतु इस बार नदी की धार जिस आक्रामकता से जमीन काट रही है, उसने सदियों पुरानी आस्था और व्यवस्था दोनों के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है।
गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल: मंदिर की सलामती के लिए उठीं दुआएं
घटनास्थल की सबसे भावुक कर देने वाली तस्वीर आपसी भाईचारे की है। नदी के मुहाने पर स्थित प्राचीन मस्जिद और ऐतिहासिक मंदिर के बीच महज बीस मीटर का फासला था। मस्जिद के धारा में समा जाने पर जहां स्थानीय हिंदू बुजुर्ग गहरी पीड़ा व्यक्त कर रहे हैं, वहीं मुस्लिम समाज के लोग मंदिर की रक्षा के लिए हाथ उठाए खड़े हैं। स्थानीय निवासी हाफिज मोहम्मद सादाब ने भावुक स्वर में कहा कि दोनों ही इबादतगाहें सदियों पुरानी धरोहर थीं। बाढ़ की विभीषिका ने मस्जिद को छीन लिया, मगर अब उनकी सबसे बड़ी तमन्ना यही है कि बाबा नारायण दास का मंदिर किसी भी तरह सुरक्षित बच जाए। वहीं ग्रामीणों ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और जिला प्रशासन से गुहार लगाई है कि इस पौराणिक धरोहर और बचे हुए घरों को बचाने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। ग्रामीणों में एक हफ्ते तक बचाव कार्य ठप रहने को लेकर प्रशासनिक सुस्ती पर भी रोष देखा गया।
बैराजों से भारी डिस्चार्ज ने बढ़ाई रफ्तार, जलस्तर में दोबारा उछाल
मंदिर के महंत अजय दास ने मौजूदा हालात की जानकारी देते हुए बताया कि नदी द्वारा कटान की प्रक्रिया करीब 10 से 12 दिन पहले शुरू हुई थी। बीच में जलस्तर में गिरावट दर्ज की गई थी, लेकिन अचानक दोबारा जलस्तर बढ़ने से किनारे की मिट्टी तेजी से ढहने लगी। कई आशियाने, मस्जिद और अन्य संरचनाएं समा जाने के बाद अब पानी मंदिर की चौखट तक पहुंच चुका है। बाराबंकी के बाढ़ खंड विभाग के अधिशासी अभियंता शशिकांत सिंह ने मौजूदा तकनीकी परिस्थितियों को स्पष्ट करते हुए बताया कि गिरिजा बैराज से लगभग 3 लाख क्यूसेक और शारदा बैराज से 1,57,000 क्यूसेक पानी का डिस्चार्ज किया जा रहा है। भारी मात्रा में छोड़े गए इस पानी के चलते घाघरा नदी का जलस्तर चरम पर है और नदी अपनी पूरी ताकत व गति के साथ बह रही है।
मोर्चे पर डटा प्रशासन, युद्ध स्तर पर जारी कटान रोधी कार्य
तटवर्ती इलाकों में गहराते खतरे को देखते हुए रामनगर की एसडीएम आकांछा गुप्ता और तहसीलदार विपुल सिंह लगातार कटान स्थल पर कैंप किए हुए हैं। प्रशासनिक अमला बचे हुए घरों और धरोहरों को बचाने के लिए सुरक्षात्मक उपायों की निगरानी कर रहा है। वहीं, बाढ़ खंड के अधिशासी अभियंता शशिकांत सिंह अपने तकनीकी कर्मचारियों और राहत दल के साथ पिछले एक सप्ताह से दिन-रात युद्ध स्तर पर नदी की धारा को मोड़ने और किनारों को पत्थरों व बोरियों से मजबूत करने के कार्य में जुटे हैं। प्रशासन की पूरी कोशिश है कि बाबा नारायण दास मंदिर के बुनियादी ढांचे को किसी भी हाल में नुकसान न पहुंचे और तटवर्ती ग्रामीणों को सुरक्षित बाहर निकाला जा सके।



















































