उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता को लेकर प्रदेशवासियों के नाम एक बेहद संवेदनशील और विचारणीय संदेश जारी किया है। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया है कि सनातन परंपरा में प्रकृति के हर एक जीव को सृष्टि का अनिवार्य हिस्सा स्वीकार किया गया है। उन्होंने विशेष रूप से युवा पीढ़ी और बच्चों से अपील की है कि जब भी उन्हें जंगलों, पहाड़ों या प्राकृतिक स्थलों पर जाने का मौका मिले, तो वे वहां महज एक आम सैलानी या पर्यटक की तरह न जाएं, बल्कि एक जिज्ञासु छात्र की तरह प्रकृति के रहस्यों को समझने और सीखने का प्रयास करें।
शहरी चकाचौंध में गायब हो रही जुगनुओं की चमक और गौरैया की चहचहाहट
सोमवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर साझा किए गए अपने विस्तृत संदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आधुनिक जीवनशैली के कारण पर्यावरण को हो रहे नुकसान पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने अतीत के दिनों को याद करते हुए लिखा कि वर्षा ऋतु में अलग-अलग कीट-पतंगों की झंकार सुनना, गर्मियों की रातों में जुगनुओं की अद्भुत टिमटिमाहट देखना, सुबह-सुबह घरों के आंगनों में गौरैया पक्षी की मधुर चहचहाहट और पेड़ों की डालियों पर मैनाओं का चहकना कभी हमारे दैनिक जीवन का स्वाभाविक हिस्सा हुआ करता था।
आज के कंक्रीट के जंगलों और आधुनिक शहरों में ये सब लगभग पूरी तरह गायब हो चुके हैं। सीएम योगी ने सचेत करते हुए कहा कि इन छोटे जीवों का इस तरह लुप्तप्राय होना बेहद चिंताजनक है और यह मानव जीवन के अस्तित्व पर मंडराते बड़े खतरे का सीधा संकेत है।
रामायण काल का उदाहरण: नन्ही गिलहरी से लेकर जटायु तक का था योगदान
मुख्यमंत्री ने विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि आधुनिकता समय की मांग है, लेकिन यह प्रकृति से विमुख होकर या उसे नष्ट करके हासिल नहीं की जा सकती। छोटे-छोटे जीव-जंतु ही पर्यावरण का असली श्रृंगार हैं और इन्हीं से पूरी खाद्य श्रृंखला (Food Chain) और कृषि का फसल चक्र नियंत्रित रहता है।
अपनी बात को सनातन संस्कृति से जोड़ते हुए उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ दिया कि जब भगवान श्री राम ने त्रिलोक विजयी रावण का संहार करने के लिए लंका पर चढ़ाई की थी, तो उनकी सेना में केवल बड़े योद्धा ही नहीं थे। उस धर्मयुद्ध में वानरों, भालुओं (ऋक्ष), राजपक्षी जटायु से लेकर एक नन्ही गिलहरी तक ने अपनी क्षमता के अनुसार अमूल्य योगदान दिया था। यह प्राचीन वृत्तांत इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि मानव, प्रकृति और जीव-जंतु हमेशा से एक-दूसरे पर पूरी तरह निर्भर रहे हैं।
9 वर्षों की अनवरत साधना: यूपी में बढ़े बाघ, तेंदुए और सारस
राज्य सरकार की पर्यावरण उपलब्धियों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करते हुए मुख्यमंत्री ने बताया कि 9 वर्ष पहले जब उनकी सरकार ने उत्तर प्रदेश की कमान संभाली थी, तभी से वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण संवर्धन को शासन की प्राथमिकताओं में शीर्ष पर रखा गया था।
इसी निरंतर इच्छाशक्ति का सुखद परिणाम है कि आज उत्तर प्रदेश में बाघों, तेंदुओं और राज्य पक्षी सारस की आबादी में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसके अलावा, वैश्विक स्तर पर पर्यावरण के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाने वाली आर्द्रभूमियों (Wetlands) की अंतरराष्ट्रीय ‘रामसर सूची’ में उत्तर प्रदेश के कुल 13 प्रमुख स्थलों ने अपनी जगह बनाने में गौरवपूर्ण सफलता हासिल की है।
चमत्कारिक वापसी: 117 साल बाद दिखा दुर्लभ सर्प और बर्डन्स बैबलर पक्षी
सरकारी प्रयासों से उत्तर प्रदेश के जंगलों में आए सकारात्मक बदलाव के कई दिलचस्प उदाहरण भी सामने आए हैं। मुख्यमंत्री ने बताया कि जिन दुर्लभ जीवों को उत्तर प्रदेश से पूरी तरह विलुप्त मान लिया गया था, वे अब जंगलों में फिर से अठखेलियां करते दिखाई दे रहे हैं।
तराई के मैदानी इलाकों और घास के मैदानों में कई दशकों के लंबे अंतराल के बाद अत्यंत दुर्लभ ‘बर्डन्स बैबलर’ पक्षी को दोबारा चहचहाते हुए देखा गया है। इसके अलावा, दुधवा टाइगर रिजर्व के घने जंगलों में ‘पेंटेड कीलबैंक’ प्रजाति का एक अत्यंत दुर्लभ सांप पूरे 117 वर्षों के लंबे समय के बाद रेंगता हुआ पाया गया है, जो राज्य के बेहतर होते इकोसिस्टम को दर्शाता है।
जनभागीदारी ही असली रक्षक: ब्लॉग लिखें और स्कूली प्रोजेक्ट का हिस्सा बनाएं बच्चे
अपने संदेश के अंतिम हिस्से में सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि कोई भी सरकारी अभियान तब तक मुकम्मल तौर पर कामयाब नहीं हो सकता, जब तक उसमें आम जनता की सक्रिय भागीदारी न हो। जैव विविधता का वास्तविक संरक्षण जन-जन के सहयोग से ही संभव है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे प्रकृति के अपने जीवंत अनुभवों को केवल अपनी यादों तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें डिजिटल लेखों, सोशल मीडिया पोस्ट और ब्लॉग्स के माध्यम से पूरी दुनिया के साथ साझा करें।
साथ ही उन्होंने सुझाव दिया कि ग्रीष्मकालीन अवकाश (Summer Vacation) के दौरान स्कूली बच्चे पर्यावरण से जुड़े इन विषयों को अपने हॉलिडे प्रोजेक्ट का मुख्य आधार बनाएं। प्रकृति के प्रति मन में पैदा होने वाली यही जागरूकता, अपनापन और संवेदनशीलता ही आने वाले समय में हमारी समृद्ध जैव विविधता की सबसे बड़ी रक्षक साबित होगी।





















































