वाराणसी के बहुचर्चित ज्ञानवापी विवाद को सुलझाने के लिए देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) द्वारा की गई मध्यस्थता की पहल के बाद काशी में एक बार फिर सियासी और कानूनी हलचल तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट के इस सकारात्मक कदम का हिंदू पक्ष के वादकारियों ने खुले दिल से स्वागत किया है। इसके साथ ही हिंदू पक्ष ने घोषणा की है कि वे जिला न्यायालय के तत्वावधान में आयोजित होने वाली मध्यस्थता संबंधी आगामी बैठक में अनिवार्य रूप से हिस्सा लेंगे। हालांकि, इस पूरे मामले में हिंदू पक्ष ने अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद कमेटी और मुस्लिम पक्ष के रुख पर गहरी निराशा व्यक्त करते हुए उन पर असहयोग करने का सीधा आरोप मढ़ा है।
मध्यस्थता से पीछे हट रहा है मुस्लिम पक्ष: सोहन लाल आर्य
ज्ञानवापी मामले के प्रमुख हिंदू वादी सोहन लाल आर्य ने इस विषय पर अपनी बेबाक राय रखी। उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा कि देश की शीर्ष अदालत द्वारा आपसी समझौते और मध्यस्थता के लिए उठाया गया यह कदम बेहद सकारात्मक है। उन्होंने कहा, “जब स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने इस विवाद को सुलझाने के लिए हाथ आगे बढ़ाया है, तो हर नागरिक को इसका सम्मान करना चाहिए। हम इस पहल का स्वागत करते हैं, लेकिन अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि ज्ञानवापी मस्जिद प्रबंधन समिति सहित मुस्लिम पक्ष ने इस मध्यस्थता प्रस्ताव को पूरी तरह खारिज कर दिया है। उनका यह अड़ियल रुख सामाजिक सद्भाव और आपसी भाईचारे के दृष्टिकोण से बिल्कुल भी उचित नहीं है।”
सोहन लाल आर्य ने मुस्लिम पक्ष की नीयत पर सवाल उठाते हुए आगे कहा कि वाराणसी जिला न्यायालय से लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट तक, वक्फ बोर्ड और प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 से जुड़े हर कानूनी मोर्चे पर मुस्लिम पक्ष को शिकस्त झेलनी पड़ी है। अब जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचाराधीन है, तो अपनी कमजोर कानूनी स्थिति को भांपते हुए मुस्लिम पक्ष जानबूझकर मध्यस्थता की मेज पर आने से कतरा रहा है।
‘विश्व में ऐसी कोई मस्जिद नहीं, जहां नीचे पूजा और ऊपर नमाज हो’
अपने दावों को मजबूती से पेश करते हुए सोहन लाल आर्य ने कई ऐतिहासिक और व्यावहारिक सवाल भी दागे। उन्होंने पूछा, “क्या पूरी दुनिया में कोई ऐसी मस्जिद मौजूद है, जिसके तहखाने में नियमित रूप से हिंदू रीति-रिवाज से पूजा-पाठ चल रहा हो और ठीक उसके ऊपर नमाज अदा की जा रही हो? क्या किसी ने आज तक किसी मस्जिद के ठीक सामने भगवान शिव के वाहन नंदी महाराज को विराजमान देखा है? ऐसा वैश्विक स्तर पर कहीं नहीं मिलता। यही प्रत्यक्ष साक्ष्य और प्रमाण इस बात की गवाही देते हैं कि यह स्थान मूल रूप से एक भव्य मंदिर है।”
मामले को लंबा खींचने की सोची-समझी रणनीति: लक्ष्मी देवी
इस मुकदमे से जुड़ी एक अन्य महिला वादी लक्ष्मी देवी ने भी मुस्लिम पक्ष की मंशा पर तीखे प्रहार किए। उन्होंने आरोप लगाया कि मुस्लिम पक्ष इस कानूनी प्रक्रिया को अंतहीन रूप से लंबा खींचना चाहता है। लक्ष्मी देवी ने कहा, “मुस्लिम पक्ष मुकदमे की शुरुआत से ही हर स्तर पर रोड़े अटकाने का काम कर रहा है। उन्हें भीतर से इस सच का पूरा अहसास है कि ज्ञानवापी कोई मस्जिद नहीं, बल्कि सदियों पुराना बाबा विश्वनाथ का मंदिर है। इसी सच का सामना करने के डर से वे मध्यस्थता की बैठकों से दूरी बना रहे हैं। इतिहास गवाह है कि साल 1669 में क्रूर मुगल शासक औरंगजेब ने यहां स्थित प्राचीन मंदिर को ध्वस्त करने का आदेश दिया था और उसके मलबे पर जबरन इस विवादित ढांचे को खड़ा किया गया था।”
‘मंदिर की घंटियां और अवशेष चीख-चीख कर कह रहे सच’: सीता साहू
हिंदू पक्ष की ओर से पैरवी कर रहीं सीता साहू ने न्यायपालिका के प्रति अपनी अटूट निष्ठा व्यक्त करते हुए कहा कि उनका अटूट विश्वास है कि यह पवित्र स्थल आदि विशेश्वर का मंदिर ही है। उन्होंने कहा, “हम हमेशा से अदालत के हर आदेश का अक्षरशः पालन करते आए हैं और आगे भी करेंगे। जहां तक समझौते की बात है, तो हिंदू पक्ष खुद शांतिपूर्ण समाधान का पक्षधर है। लेकिन हम उस स्थान को मस्जिद कैसे स्वीकार कर सकते हैं, जो हमारे आराध्य का घर है? अगर सुप्रीम कोर्ट या मुस्लिम पक्ष सच को स्वीकार करते हुए स्वेच्छा से यह परिसर हिंदुओं को सौंप दे, तो यह विवाद हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। किसी भी मस्जिद में मंदिर के अवशेष, कलाकृतियां और घंटियां नहीं पाई जातीं, जो ज्ञानवापी में स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं।”
सदियों पुराना है काशी का यह ऐतिहासिक विवाद
उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी में स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद का यह कानूनी विवाद दशकों पुराना है। हिंदू पक्ष का निरंतर यह दावा रहा है कि विदेशी आक्रांता औरंगजेब ने काशी के मूल मंदिर को आंशिक रूप से तोड़कर वहां मस्जिद का निर्माण कराया था। इस दावे को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की वैज्ञानिक सर्वेक्षण रिपोर्ट से भी बल मिला है, जिसमें विवादित ढांचे के नीचे एक प्राचीन भव्य मंदिर के स्तंभ, अवशेष और देवी-देवताओं के विग्रह मिलने की बात कही गई है। इसके विपरीत, मुस्लिम पक्ष कानूनी लड़ाई में ‘प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991’ (उपासना स्थल अधिनियम) की धारा 4 का हवाला दे रहा है, जिसके तहत 15 अगस्त 1947 से पहले मौजूद किसी भी धार्मिक स्थल के स्वरूप को बदलने पर कानूनी रोक है। इसी कानून के आधार पर मुस्लिम पक्ष ज्ञानवापी के वर्तमान स्वरूप में किसी भी प्रकार के बदलाव या सर्वे का विरोध कर रहा है।





















































