डेयरी उद्योग और पशुपालन के क्षेत्र से एक ऐसी बेहद हैरान और दंग कर देने वाली खबर सामने आई है, जिसने वैज्ञानिकों से लेकर आम जनता तक को सोचने पर मजबूर कर दिया है। जिस बीयर का सेवन इंसानों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माना जाता है, वही बीयर अब भैंसों का दूध बढ़ाने के लिए एक जादुई फॉर्मूला साबित हो रही है। इस अनोखे और अभूतपूर्व तरीके को अपनाने के बाद दुग्ध उत्पादन में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिसे सुनकर पहली बार में कोई भी अपनी कानों पर विश्वास नहीं कर पा रहा है।
परंपरागत तरीकों को छोड़ पशुपालकों ने अपनाया यह अजीब फॉर्मूला
अब तक आपने ग्रामीण इलाकों या बड़े डेयरी फार्मों में गाय और भैंसों का दूध बढ़ाने के लिए कई तरह के जतन देखे होंगे। पशुपालक अक्सर अपने जानवरों को महंगे पौष्टिक आहार, चोकर, खली, कपास के बीज या फिर कई बार प्रतिबंधित और जानलेवा ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन देते हैं। लेकिन बाजार में बढ़ती महंगाई और चारे के संकट के बीच पशुपालकों ने एक ऐसा अनोखा और सस्ता शॉर्टकट ढूंढ निकाला है, जिसने पूरे डेयरी सेक्टर में तहलका मचा दिया है। यह नया तरीका पूरी तरह से बीयर और उसके उत्पादन चक्र से जुड़ा हुआ है।
क्या भैंस सचमुच बीयर पी रही हैं? जानिए इसके पीछे का असली सच
इस खबर के सोशल मीडिया पर आते ही यह अफवाह उड़ने लगी कि भैंसों को सीधे तौर पर लिक्विड बीयर पिलाई जा रही है, लेकिन हकीकत इससे थोड़ी अलग और तकनीकी है। दरअसल, भैंसों को कोई ब्रांडेड बोतल बंद बीयर नहीं पिलाई जा रही, बल्कि बीयर तैयार होने के बाद जो ठोस गाढ़ा अवशेष (जिसे आम भाषा में मलबा या ‘ब्रूअर्स स्पेंट ग्रेन’ कहा जाता है) बचता है, उसे खिलाया जा रहा है।
डेयरी उद्योग से जुड़े बड़े सप्लायर्स और सूत्रों की मानें तो इस मलबे को चारे या भूसे में मिलाकर भैंसों को परोसा जा रहा है। इसे खाने के बाद भैंसों के व्यवहार में कोई नकारात्मक बदलाव या नशा नहीं देखा गया, बल्कि इसके उलट उनकी दूध देने की क्षमता चमत्कारी रूप से बढ़ गई है। जिन भैंसों का दूध एक निश्चित स्तर पर रुक गया था, वे अब रोजाना 2 से 3 लीटर अधिक दूध दे रही हैं, जिससे पशुपालकों की चांदी हो गई है।
जौ की ताकत से बढ़ता है दूध: क्या कहता है विज्ञान?
इस अनोखे प्रयोग पर आम जनता भले ही अपनी उंगलियां दांतों तले दबा रही हो, लेकिन पशु विज्ञान के जानकारों के पास इसका एक सटीक तार्किक जवाब है। दरअसल, फैक्ट्रियों में बीयर को मुख्य रूप से ‘जौ’ (Barley) को सड़ाकर और फरमेंट करके तैयार किया जाता है। बीयर छन जाने के बाद जो गाढ़ा वेस्ट मटेरियल बचता है, उसमें जौ के सबसे पौष्टिक तत्व मौजूद रह जाते हैं।
पशु विशेषज्ञों के अनुसार, इस मलबे में प्रोटीन, फाइबर और कार्बोहाइड्रेट की बेहद उच्च मात्रा होती है। जब यह पशुओं के पेट में जाता है, तो यह उनके पाचन तंत्र को दुरुस्त करता है और शरीर में दुग्ध ग्रंथियों को तेजी से सक्रिय कर देता है। यही वजह है कि इसे खाने के बाद भैंसें शारीरिक रूप से अधिक ऊर्जावान महसूस करती हैं और उनका दुग्ध उत्पादन प्राकृतिक रूप से बढ़ जाता है।
क्या पशुओं की सेहत के लिए सुरक्षित है यह तरीका? बंटी हुई है राय
शहर की आधी से ज्यादा डेरियों में इस मलबे का इस्तेमाल इतनी तेजी से बढ़ा है कि अब इसकी मांग बाजारों में आसमान छू रही है। हालांकि, इस बात को लेकर अभी भी जानकारों और डॉक्टरों के बीच सहमति नहीं बन पाई है। डॉक्टरों का एक धड़ा जहां इसे जौ का प्राकृतिक अर्क मानकर पशुओं के लिए सुरक्षित और किफायती बता रहा है, वहीं दूसरी ओर कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि फैक्ट्रियों से निकलने वाले इस मलबे में रासायनिक अशुद्धियां हो सकती हैं। लंबे समय तक इसका सेवन करने से पशुओं के लीवर या दूध की गुणवत्ता पर क्या दीर्घकालिक असर पड़ेगा, इस पर अभी और गहन शोध की आवश्यकता है।
बदलते दौर में भारतीय डेयरी सेक्टर लगातार नए प्रयोगों से गुजर रहा है। बीयर के मलबे से भैंसों का दूध बढ़ना भले ही सुनने में बेहद अजीब और अचरज भरा लगे, लेकिन यह पशुपालकों के लिए इस समय बेहद कम लागत में अधिक मुनाफा कमाने का बड़ा जरिया बन चुका है। बहरहाल, जब तक सरकारी विभागों या कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा इसे पूरी तरह से प्रमाणित नहीं कर दिया जाता, तब तक पशुपालकों को अत्यधिक मात्रा में इसका इस्तेमाल करने से बचना चाहिए, ताकि बेजुबान पशुओं के स्वास्थ्य और दूध पीने वाले इंसानों की सेहत के साथ कोई समझौता न हो।


















































