उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य ढांचे को आम नागरिकों के लिए अधिक सुलभ और पारदर्शी बनाने की दिशा में राज्य सरकार ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। प्रदेश के उपमुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री ब्रजेश पाठक ने शुक्रवार को राज्य भर के चिकित्सकों से मरीजों के परामर्श पर्चे (प्रिस्क्रिप्शन) पर दवाओं के नाम हिंदी में दर्ज करने का विशेष आग्रह किया है। इस कदम का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ग्रामीण और सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाले मरीज बिना किसी भाषाई बाधा के यह भली-भांति जान सकें कि उन्हें कौन-सी औषधि और किस खुराक में दी जा रही है।
सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर साझा किया पत्र
डिप्टी सीएम ने सरकारी एवं निजी क्षेत्र के चिकित्सकों को संबोधित इस विशेष पत्र को अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर सार्वजनिक किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब कोई सामान्य नागरिक क्लिनिक या अस्पताल पहुंचता है, तो जटिल अंग्रेजी लिखावट के कारण पर्चे पर लिखी दवाइयों को समझ पाना उसके लिए बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है। यदि डॉक्टर परामर्श पत्र पर दवाओं के विवरण मातृभाषा अथवा हिंदी लिपि में अंकित करेंगे, तो इससे मरीजों की न केवल बुनियादी सहूलियत बढ़ेगी, बल्कि चिकित्सा व्यवस्था के प्रति उनका भरोसा भी और अधिक गहरा होगा।
स्थानीय बोलियों से घटेगी दूरी, मजबूत होगा विश्वास
संवाद की महत्ता को रेखांकित करते हुए ब्रजेश पाठक ने कहा कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति लोकभाषा और जनभाषा से ही जीवंत रहती है। उन्होंने चिकित्सकों को प्रेरित किया कि वे मरीजों से बातचीत करते समय उनकी अपनी स्थानीय बोलियों—जैसे अवधी, भोजपुरी और ब्रजभाषा—का अधिक से अधिक प्रयोग करें। स्वास्थ्य मंत्री के अनुसार, जब एक चिकित्सक मरीज की मातृभाषा में उससे संवाद स्थापित करता है, तो मरीज अपनी शारीरिक व्याधियों और असहजताओं को खुलकर साझा कर पाता है। इसके फलस्वरूप सही निदान संभव होता है और चिकित्सकीय परामर्श को समझने में कोई भ्रम शेष नहीं रहता।
दीनदयाल उपाध्याय जयंती पर भाषाई संकल्प का आह्वान
उपमुख्यमंत्री ने इस पहल को एकात्म मानववाद के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती के पावन अवसर से जोड़ते हुए कहा कि चिकित्सा सेवा में भारतीय भाषाओं, विशेष रूप से हिंदी के अधिकतम प्रयोग का संकल्प लेना एक सार्थक श्रद्धांजलि होगी। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि वैश्विक मंचों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी हिंदी और भारतीय भाषाओं के माध्यम से संवाद कर देश की समृद्ध सांस्कृतिक व भाषाई अस्मिता को निरंतर सशक्त कर रहे हैं। इसी भाव को आत्मसात करते हुए चिकित्सकों को भी अपनी कार्यप्रणाली में भाषाई सरलता अपनानी चाहिए, ताकि दूर-दराज के गांवों से आने वाले अंतिम व्यक्ति तक बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं सहज रूप में पहुंच सकें।




















































