उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज इलाके में सोमवार को हुए भीषण अग्निकांड ने पूरे सिस्टम की पोल खोलकर रख दी है। जिस तीन मंजिला ‘मौत की इमारत’ में जलकर 15 लोगों की दर्दनाक मौत हुई है, उसे करीब एक दशक पहले ही जमींदोज करने का आदेश जारी हो चुका था। राज्य सरकार द्वारा देर रात जारी किए गए आधिकारिक बयान ने लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह एक दिल दहला देने वाला सच है कि अगर 2016 में ही प्रशासनिक आदेशों का सख्ती से पालन किया गया होता और वह आदेश वापस नहीं लिया जाता, तो आज 15 बेगुनाह लोग अपने परिवारों के बीच जिंदा होते।
सिस्टम की ‘मेहरबानी’ और रद्द हो गया ध्वस्तीकरण का आदेश
सरकारी दस्तावेजों और हालिया रिपोर्ट के अनुसार, सोमवार को जिस इमारत ने 15 जिंदगियों को निगल लिया, उसका निर्माण पूरी तरह से अवैध और मानकों के विपरीत था। साल 2016 में ही लखनऊ विकास प्राधिकरण को इस अवैध निर्माण की भनक लग गई थी। प्राधिकरण ने तत्कालीन मालिक वीरेन्द्र प्रताप शुक्ला के खिलाफ बाकायदा मुकदमा (संख्या-08/2016) दर्ज कराया था। लंबी जांच-पड़ताल के बाद 10 मई 2016 को इस गैरकानूनी ढांचे को ढहाने का सख्त आदेश भी पारित किया गया। लेकिन सिस्टम की ‘जादूगरी’ देखिए कि महज दो महीने के भीतर, 5 जुलाई 2016 को यह ध्वस्तीकरण आदेश रहस्यमयी तरीके से निरस्त कर दिया गया। यही एक प्रशासनिक लापरवाही आज इतने बड़े हादसे का मुख्य कारण बनकर सामने आई है।
लॉटरी से आवंटन और बदलती रही इमारत की मिल्कियत
इस विवादित संपत्ति के इतिहास के पन्ने पलटें तो पता चलता है कि इसका सफर कई दशकों पुराना है। 11 जुलाई 1980 को अलीगंज के सेक्टर-डी में स्थित लगभग 1992 वर्गफुट के इस भूखंड को लॉटरी प्रणाली के माध्यम से ‘किराया-क्रय’ पद्धति पर विजय कुमार नामक व्यक्ति को आवंटित किया गया था। उसी वर्ष 4 नवंबर को उन्हें इसका कब्जा भी सौंप दिया गया। समय बीतने के साथ-साथ इस इमारत के मालिक बदलते रहे। साल 2005 में एक विक्रय विलेख (सेल डीड) के माध्यम से यह संपत्ति विजय कुमार और उनकी पत्नी उषा के नाम विधिवत दर्ज हुई। इसके बाद, 19 जनवरी 2013 को इस दंपत्ति ने यह इमारत वीरेन्द्र प्रताप शुक्ला और सुरेन्द्र प्रताप शुक्ला को बेच दी।
आवासीय नक्शे की आड़ में पनपा ‘अवैध’ ढांचा
प्रशासनिक अनदेखी का आलम यह था कि 20 अगस्त 2014 को स्वतः मानचित्र योजना के तहत इस इमारत का नक्शा केवल ‘आवासीय उपयोग’ (Residential Use) के लिए स्वीकृत करवाया गया था। नियमों को ताक पर रखकर बाद में इसमें बड़े पैमाने पर अनाधिकृत निर्माण किया गया, जिसके चलते ही एलडीए ने कार्रवाई की शुरुआत की थी, जो कभी अपने तार्किक अंजाम तक नहीं पहुंच सकी। अब राज्य सरकार इमारत से जुड़े पुराने दस्तावेजों को गहराई से खंगाल रही है, जिससे भविष्य में कई जिम्मेदार अधिकारियों पर गाज गिरना तय माना जा रहा है।
हादसे में 15 की मौत, 4 आरोपी चढ़े पुलिस के हत्थे
सोमवार की उस मनहूस शाम को इसी तीन मंजिला इमारत में भीषण आग भड़क उठी। आग की लपटें इतनी तेज थीं कि अंदर मौजूद लोगों को बाहर निकलने का मौका ही नहीं मिला। इस दर्दनाक हादसे में कम से कम 15 लोगों की झुलसकर मौत हो गई, जबकि 9 अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए जिनका इलाज अभी भी जारी है। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पुलिस ने त्वरित कार्रवाई की है और इमारत के मालिकों सहित कुल चार लोगों को गिरफ्तार कर लिया है। पकड़े गए आरोपियों में राम कृष्ण उपाध्याय (43 वर्ष), वीरेंद्र प्रसाद शुक्ला (62 वर्ष), तुषार कृष्ण जायसवाल (31 वर्ष) और सुरेश कुमार साहू शामिल हैं। इनमें से उपाध्याय, शुक्ला और जायसवाल इस ‘मौत की इमारत’ के संयुक्त मालिक (Joint Owners) बताए जा रहे हैं।





















































