सहारनपुर। उत्तर प्रदेश की एक त्वरित अदालत (फास्ट ट्रैक कोर्ट) ने पुलिस व्यवस्था को शर्मसार करने वाले ग्यारह वर्ष पुराने जघन्य मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। खाकी की आड़ में थाने के भीतर ढाई माह की गर्भवती महिला के साथ अनाचार करने के जुर्म में अदालत ने दो तत्कालीन पुलिस अधिकारियों को 20-20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (त्वरित अदालत) प्रबोध कुमार वर्मा की अदालत ने दोनों दोषियों पर 1.20 लाख-1.20 लाख रुपये का अर्थदंड भी अधिरोपित किया है। अदालत के इस कड़े रुख से यह स्पष्ट संदेश गया है कि कानून के रक्षक यदि भक्षक बनेंगे तो अदालतें उन्हें कतई नहीं बख्शेंगी।
फर्जी मुकदमे में फंसे पति की रिहाई मांगने गई थी पीड़िता, थाने में हुआ अनाचार
यह दिल दहला देने वाला मामला अगस्त 2015 का है, जब देवबंद थाना क्षेत्र की निवासी पीड़िता के पति को पुलिस ने एक कथित मनगढ़ंत मामले में हिरासत में ले लिया था। अपने जीवनसाथी को निर्दोष बताते हुए न्याय की गुहार लगाने के लिए महिला देवबंद कोतवाली पहुंची थी। पीड़िता उस समय ढाई महीने के गर्भ से थी। थाने पहुंचने पर तत्कालीन थाना प्रभारी निरीक्षक ब्रजमोहन यादव, उपनिरीक्षक वेगपाल सिंह तथा उनके अन्य साथियों ने असहाय महिला की लाचारी का फायदा उठाते हुए उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। घटना के दौरान जब थाने में उपस्थित पीड़िता की ननद ने इस घिनौने कृत्य का प्रतिरोध किया, तो पुलिसकर्मियों ने बर्बरता दिखाते हुए उसके साथ भी गंभीर मारपीट की थी।
अधिकारियों ने साधी चुप्पी तो पीड़िता ने खटखटाया उच्च न्यायालय का दरवाजा
घटना के उपरांत पीड़िता ने न्याय पाने के लिए स्थानीय देवबंद कोतवाली से लेकर तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) की चौखट तक लिखित शिकायतें दीं। खाकी के प्रभाव के चलते लंबे समय तक पुलिस महकमे में उसकी फरियाद को दबाने का प्रयास किया गया और प्राथमिकी तक दर्ज नहीं हुई। व्यवस्था की उदासीनता से हार मानने के बजाय पीड़िता ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की शरण ली। उच्च न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) को अविलंब प्राथमिकी दर्ज करने का सख्त आदेश दिया। इसके बाद न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ी और प्रकरण सत्र न्यायालय होते हुए त्वरित अदालत में स्थानांतरित हुआ। इस संगीन मामले की निष्पक्ष जांच सीबीसीआईडी को भी सौंपी गई थी।
पदोन्नति पाकर सीओ बन गया था एक आरोपी, दूसरा बन चुका था निरीक्षक
मुकदमे की लंबी कानूनी लड़ाई के दौरान दोनों आरोपी पुलिसकर्मी विभागीय लाभ उठाते हुए पदोन्नत होते रहे। मुख्य दोषी ब्रजमोहन यादव पदोन्नति पाकर पुलिस क्षेत्राधिकारी (सीओ) के पद तक पहुंचा और बाद में सेवानिवृत्त हो गया। वहीं, 58 वर्षीय दूसरा दोषी वेगपाल सिंह भी तरक्की पाकर निरीक्षक बन चुका था और वर्तमान में गैर-जनपद में कार्यरत था। मामले में शामिल एक अन्य तत्कालीन चौकी प्रभारी ने मानसिक अस्वस्थता का हवाला देकर कानूनी कार्रवाई से बचने का प्रयास किया, जिससे उसके विरुद्ध विचारण रुक गया। चौथे आरोपी सिपाही की पहचान व सुराग न मिल पाने के कारण अभियोजन का मुख्य मुकदमा ब्रजमोहन यादव और वेगपाल सिंह पर ही केंद्रित रहा।
11 वर्ष 3 महीने की लंबी कानूनी जंग के बाद मिला इंसाफ, दोनों दोषी भेजे गए सलाखों के पीछे
पीड़ित पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव तोमर ने फैसले की पुष्टि करते हुए बताया कि पीड़िता को न्याय हासिल करने के लिए 11 साल और 3 महीने तक अनवरत संघर्ष करना पड़ा। अदालत द्वारा दोष सिद्ध किए जाने और 20-20 साल के कारावास का फैसला सुनाए जाने के तुरंत बाद दोनों पुलिस अधिकारियों को हिरासत में लेकर जेल भेज दिया गया। अधिवक्ता राजीव तोमर ने यह भी स्पष्ट किया कि यह अपराध खाकी के संरक्षण में हुआ अत्यंत घिनौना कृत्य है, इसलिए वे दोषियों को अधिकतम सजा यानी आजीवन कारावास दिलाने के उद्देश्य से उच्च न्यायालय में अपील दाखिल करेंगे।


















































