नई दिल्ली
देश में आंदोलन के जरिए विपक्ष लगातार सरकार विरोधी माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है। सोशल मीडिया से लेकर मीडिया तक में इस बा की चर्चा हो रही है। हालांकि, जब चुनावी राजनीति की बात आती है तो यहां आज भी भाजपा का वर्चस्व दिखता है। हाल ही में संपन्न विधानसभा और लोकसभा उपचुनाव के नतीजों ने तो और चौंका दिया है। बंगाल की रेजीनगर विधानसभा और असम की नगांव विधानसभा सीट के नतीजे ने जरूर विपक्ष की चिंता बढ़ा दी होगी। इन दोनों मुस्लिम बहुत सीट पर भाजपा ने शानदार जीत हासिल की है। रेजीनगर जीतने के बाद तो पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ने तो यहां तक कह दिया है कि मुस्लिम हमारे (भाजपा के) दोस्त बन गए हैं।
रेजीनगर की चर्चा हमने पहले भी की थी। आज हम असम के नगांव लोकसभा सीट के बारे में आपको बताने वाले हैं, जहां करीब 13 मुस्लिम बताए जा रहे हैं। यहां हिंदू मतदाताओं की आबादी महज सात लाख के करीब है। विपक्ष यह मानकर चलता है कि मुस्लिम और भाजपा एक-दूसरे के लिए सियासी अछूत हैं। हालांकि इस दोनों नतीजों ने इस धारना को बदलकर रख दिया है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि असम में भाजपा ने यह कमाल कैसे कर दिखाया।
सरमा रहे जीत के रणनीतिकार
असम की इस सीट पर जीत के सबसे बड़े रणनीतिकार मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को माना जा रहा है। इस उपचुनाव में भाजपा की रणनीति और प्लानिंक काफी हद तक काम की है। 2023 में सीटों के नए बंटवारे के बाद नगांव सीट साफ तौर पर मुस्लिम-बहुमत वाली लोकसभा सीट बन गई। यहां BJP की जीत मुश्किल लग रही थी। सरमा ने उम्मीदवार चयन से लेकर चुनाव प्रचार तक की रणनीति खुद संभाली। भाजपा ने यहां पूर्व IAS अधिकारी और इसी जिले में अपनी सेवा दे चुके देवाशीष शर्मा को उम्मीदवार बनाया। उन्होंने बदरुद्दीन अजमल को करीब 1.4 लाख मतों से हरा दिया। कांग्रेस यहां पिछड़कर तीसरे नंबर पर जा पहुंची।
मुस्लिम वोटरों का विपरीत ध्रुवीकरण रोका
हिमंत सरमा ने उपचुनाव से काफी पहले ही देवाशीष शर्मा को नगांव का कमिश्नर नियुक्त कर दिया था। इस दौरान उन्होंने सभी समुदायों तक कल्याणकारी योजनाओं को पहुंचाने की कोशिश की। इससे क्षेत्र में उनकी छवि अच्छी बन गई। जब उपचुनाव के लिए प्रचार अभियान चलाए जा रहे थे तब इस बात का ध्यान रखा गया कि मुस्लिम वोटरों का विपरीत ध्रुवीकरण नहीं हो। इससे बचने के लिए प्रचार को जान-बूझकर लो प्रोफाइल रखा गया। वहीं, हिंदू वोट मजबूती से एकजुट हो गए।
इस उपचुनाव में बदरुद्दीन अजमल देर से मैदान में उतरे। इसकी वजह से विपक्ष बंट गया और उपचुनाव होने की वजह से विचारधारा से जुड़े बड़े मुद्दों का असर भी कम रहा। वहीं, हिमंत सरमा को चुनाव मैनेजमेंट का माहिर खिलाड़ी माना जाता है। उनके बारे में कहा जाता है कि वह पिछली हार से सीखते हैं। यही वजह है कि उन्होंने इस उपचुनाव की तैयारी पहले से ही शुरू कर दी थी।




















































