अयोध्या की पावन धरा पर पहुंचे ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने राम मंदिर, सनातन संस्कृति और गौ रक्षा के संदर्भ में कई महत्वपूर्ण और विचारोत्तेजक बातें साझा की हैं। अपनी अयोध्या यात्रा के दौरान उन्होंने स्पष्ट किया कि राम जन्मभूमि का मुद्दा केवल एक भौतिक निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सनातन धर्म के गौरवशाली इतिहास और न्यायिक सत्य की विजय का प्रतीक है।
‘राम लल्ला ही हैं मंदिर के असली स्वामी’
राम मंदिर के निर्माण के श्रेय को लेकर चल रही राजनीतिक चर्चाओं के बीच शंकराचार्य ने एक बड़ा दृष्टिकोण रखा है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि मंदिर निर्माण को किसी भी राजनीतिक दल या सरकार की सफलता के रूप में देखना उचित नहीं है। उनके अनुसार, यह पूरी तरह से एक लंबी न्यायिक प्रक्रिया का परिणाम है।
शंकराचार्य ने जोर देकर कहा कि इस पूरे कानूनी संघर्ष में मुख्य पक्षकार स्वयं ‘राम लल्ला विराजमान’ थे, और सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला भी उन्हीं के पक्ष में आया। उन्होंने तर्क दिया कि जब कानूनी जीत राम लल्ला की हुई है, तो मंदिर के मुख्य गर्भगृह और सिंहासन पर अधिकार भी केवल उन्हीं का है। यह टिप्पणी मंदिर की गरिमा और धार्मिक स्वामित्व को लेकर एक बड़ा स्पष्टीकरण मानी जा रही है।
सनातन धर्म का केंद्र: अयोध्या
अयोध्या के महत्व पर प्रकाश डालते हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इसे केवल एक भौगोलिक नगर नहीं, बल्कि सनातन धर्म की आधारशिला बताया। उन्होंने कहा कि त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने इसी स्थान को अपनी जन्मभूमि के रूप में चुनकर धर्म को व्यावहारिक रूप प्रदान किया था। शंकराचार्य के मुताबिक, इसीलिए मोक्ष प्रदान करने वाली सात पवित्र पुरियों में अयोध्या को सर्वोपरि स्थान दिया गया है। उन्होंने दुख व्यक्त करते हुए कहा कि कलियुग के प्रभाव के चलते एक समय ऐसा भी आया जब राम जन्मभूमि का अस्तित्व लुप्तप्राय हो गया था, लेकिन धर्म की शक्ति ने अंततः इसे पुनर्जीवित किया।
‘गविष्टि यात्रा’ और गौ माता का महत्व
शंकराचार्य ने अपनी बहुचर्चित ‘गविष्टि यात्रा’ के उद्देश्यों को भी विस्तार से साझा किया। उन्होंने बताया कि अब तक लगभग 375 विधानसभा क्षेत्रों में जाकर उन्होंने आम मतदाताओं के साथ सीधा संवाद किया है। ‘गविष्टि’ का अर्थ स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि इसका सीधा संबंध गौ माता के सम्मान और उनके जीवन की सुरक्षा से है।
उन्होंने समाज को सचेत करते हुए कहा कि गौ माता को केवल दूध या मांस देने वाले पशु के रूप में देखना एक संकीर्ण सोच है। उनका जीवन और अस्तित्व मानव कल्याण के लिए कहीं अधिक व्यापक है। स्वामी जी ने एक गहरा आध्यात्मिक संबंध जोड़ते हुए कहा, “यदि गौ माता का संरक्षण न हुआ होता, तो शायद आज राम जन्मभूमि का गौरवशाली स्थान हमारे पास सुरक्षित नहीं होता।”
सामूहिक जिम्मेदारी का आह्वान
अंत में, शंकराचार्य ने देशवासियों से अपनी सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक मूल्यों और गौ संरक्षण के प्रति जागरूक होने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि धर्म और न्याय की रक्षा करना केवल किसी संस्था का नहीं, बल्कि पूरे समाज का सामूहिक कर्तव्य है। इन पवित्र मूल्यों को आने वाली पीढ़ियों तक पूरी निष्ठा के साथ पहुंचाना ही हमारी असली विरासत होगी। उनका यह संदेश अयोध्या की मिट्टी से पूरे देश को सांस्कृतिक एकता और नैतिक जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाता है।





















































